Tuesday, 6 December 2011

महबूब


                    महबूब
अक्सर तन्हाईयों में, मैं ये सोचता हूँ l
हसीनाओं के भीड़ में, एक अपना हमसफ़र खोजता हूँ ll
वो हँसी दिलरुबा, दिलकशी होगी,
मेरा महबूब, मेरा हमदम महजबी होगी
आँख हो जिसके छलकते प्याले
जाम को जिसके, पीकर मैं झूमता हूँ
अक्सर तन्हाईयों में, मैं ये सोचता हूँ l
हसीनाओं के भीड़ में, एक अपना हमसफ़र खोजता हूँ ll

होंठ जिसके खिलता कमल हो,
फुल से मैं प्यार को पूजता हूँ l
हँसने से जिसके बिखरे मोती,
मोती से मैं सपनों की माला संजोता हूँ l
अक्सर तन्हाईयों में, मैं ये सोचता हूँ l
हसीनाओं के भीड़ में, एक अपना हमसफ़र खोजता हूँ ll

बिंदिया हो जिसके चाँद सितारे l
जिनसे बने सारे प्यारे नज़ारे l
जुल्फ हो जिसके काले काले l
ओढ़कर सोये जिसे उजाले l 

आवाज से जिसके मिठास टपके,
मिठास को मैं जीवन में घोलता हूँ l
अक्सर तन्हाईयों में, मैं ये सोचता हूँ l
हसीनाओं के भीड़ में, एक अपना हमसफ़र खोजता हूँ ll

नख से शिख तक जिसके अदा ही अदा हो l 
अदा भी ऐसी, जो सबसे जुदा हो l
उस पर मेरा दिल फ़िदा हो l
ऐसे सपनों के परी को, मैं दिन में खोजता हूँ l
अक्सर तन्हाईयों में, मैं ये सोचता हूँ l
हसीनाओं के भीड़ में, एक अपना हमसफ़र खोजता हूँ ll  


(इन रचनाओ पर आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए मार्गदर्शक  बन सकती है, 
आप की प्रतिक्रिया के इंतजार में l )
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