Monday, 3 December 2012

सिद्धाश्रम - गुरु वाणी


गुरुदेवजी का साक्षात्कार - II

सिद्धाश्रम - गुरु वाणी

सिद्धाश्रम शब्द से ही यह बोध होता है की यह दो शब्दों के युग्मों से बना है - सिद्ध और आश्रम l सिद्ध अर्थात पूर्ण या पवित्र और आश्रम अर्थात वह स्थान जहाँ जाकर परिश्रम करने की शिक्षा प्राप्त किया जाये या परिश्रम किया जाये वह स्थान आश्रम कहलाता है l जिससे व्यक्ति के जीवन जीने की शैली का समुचित विकास होता है l हिन्दू धर्म में व्यक्ति के जीवन जीने की शैली को चार भागों में बांटा गया है l १. – ब्रम्हाचार्य, २. – गृहस्थ, ३. – वानप्रस्थ और ४. - सन्यास और इन्हें ही आश्रम की संज्ञा दी जाती है l जिनका पालन कर मनुष्य अपने पुरुषार्थ में वृद्धि करने के साथ-साथ पूर्णत्व को प्राप्त कर नर से नारायण बन सकता है l या इसे यों कह सकते है कि नर से नारायण बनने की प्रकिया का नाम ही आश्रम है l

इस प्रकार हम कह सकते है कि पूर्ण या पवित्रता को प्राप्त करने वाला वह पुन्य भूमि जहाँ जाकर परिश्रम या साधनाओं के द्वारा हम पूर्णत्व को या सिद्धित्व को प्राप्त कर सकें सिद्धाश्रम कहलाता है l सिद्ध योगियों ने काल चक्र के प्रभाव को समझा और उसके प्रभाव से मुक्त रहने व सृष्टि के सृजन करने के लिए अपने तपो बल से पृथ्वी पर ऐसे ही आश्रम का निर्माण किया है l कहा जाता है उसके सीमा क्षेत्र में प्रकृति का कोई भी नियम, कोई भी सिद्धांत लागु नहीं होता है, इंसान जन्म मरण के चक्र से ऊपर उठ जाता है और सालों या हजारों सालों तक साधनाएँ कर सकता है l वस्तुतः देखा जाये तो पृथ्वी पर स्थित उसी स्वर्ग का नाम ही सिद्धाश्रम है l

वर्त्तमान समय में उस दिव्य एवं पावन स्थलीय सिद्धाश्रम का अस्तित्व हिमालय में आज भी पूर्ण रूप से सुरक्षित है l योगी, तपस्वी  और तांत्रिक इसीलिए हिमालय में तप और साधना करने के लिए लालायित रहते है l परन्तु सदगुरुदेव की असीम अनुकम्पा, आशीर्वाद और साधना के बिना उस दिव्य एवं पावन भूमि में प्रवेश किया ही नहीं जा सकता है l इसीलिए गृहस्थ लोगों के लिए पारमेष्ठीय माता-पिता और गुरुचरणों को भी सिद्धाश्रम कहा गया है l जिनकी श्रद्धा, विश्वास और निश्वार्थ भाव से सेवा कर निश्चय ही मनुष्य जन्म-मरण के चक्र से ऊपर उठ कर मोक्ष को प्राप्त कर सकता है l


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गोकुल कुमार पटेल

Saturday, 17 November 2012

विदाई


विदाई
हे बंधू आपने जिस प्यार से,
इस मंदिर को सजाया है l
करके सुआचरणों का पालन,
गुरुजनों का बढाया है l l
हम भी उसी प्यार के रंगों से,
इस मंदिर को रंगायेंगे l
सदाचार का करके पालन,
गुरुजनों का मान बढ़ाएंगे l l
सदा अच्छे बनाने के लिए,
अनुशासन को आपने स्वीकार किया l
भेदभाव न माना कभी आपने,
छोटों बड़ों को प्यार किया l l
हम भी सदा उसी अनुशासन को अपनाएंगे l
भेदभाव को मिटाकर,
हम भी प्यार का दीप जलाएंगे l l
गुरु तो गुरु है ही,
पर आपने भी गुरु का काम किया l
लाकर अच्छे अंक आपने,
स्कुल और गुरुजनों का नाम किया l l
अनुज है हम तुम्हारे,
तुम्हारे पथ पर चलते जायेंगे l
लाकर अच्छे अंक हम भी,
स्कुल और गुरुजनों का कीर्ति बढ़ाएंगे l l
सखा मिले आप सा इसका हमें पता नहीं l
पढाई करनी है आगे आपको,
इसमें आपकी कोई खता नहीं l l
आगे की पढाई हमको आपसे जुदा करते है l
नमन कर शुभकामनाओं के साथ,
हम भी आपको विदा करते है l l



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Wednesday, 7 November 2012

सपना है या अनुभूति -7


सपना है या अनुभूति -7


वत्स - उठो.. .?

आँखें खोलो? कब तक सोये रहोगे? देखो मैं आ गया हूँ ? एक चिर परिचित आवाज ने मेरी आँखें खोल दी, देखा एक सुन्दर कमल के आसन पर गेरुआ वस्त्र से सुशोभित, हाथ और गले में रुद्राक्ष की माला पहने, अखंड सूर्य से प्रकाशित आभा और त्रिलोक को वश में करने वाली मंद मंद मुस्कान लिए सदगुरुदेवजी मेरे समीप दिखाई दिए l

मैं उठा और बिस्तर पर बैठे-बैठे ही उनको प्रणाम किया, मुझे स्मरण हो आया की मेरे पुत्री का जन्म हुआ तब सभी की भांति मैंने भी जन्मोत्सव का पहला आमंत्रण पत्र ईश्वर के चरणों में समर्पित किया और अपने पुत्री के उज्जवल भविष्य के लिए उनसे आशीर्वाद देने का आग्रह किया l  

सदगुरुदेव जी बोल रहे थे वत्स तुमने  पहला आमंत्रण पत्र मुझे दिया था देखो सबसे पहले मैं ही आया हूँ l मुझे अपने आँखों पर अपने आप पर विश्वास नहीं हो रहा था की उन्होंने मेरा आमंत्रण स्वीकार ही नहीं किया अपितु वे आशीर्वाद देने मेरे घर भी आये है l मैं आवक सा मंत्रमुग्ध और इतना भाव विभोर हो गया की भावुकता वश मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था और आँखों से ख़ुशी के आंसू थे की मेरे चाहने पर भी थम नहीं रहे थे l  मैं असमंजस में पड़ गया की गुरूजी का कैसे आदर सत्कार कैसे करूँ, उनका आभार व्यक्त कैसे करूँ l 

शायद सदगुरुदेव मेरे मनः स्थिति को भाँप गए l

उन्होंने मुझसे पूछा - वत्स ! पुत्री को मेरे गोद में दो? मुझे भी तो दुलार करने  दो?

मैं पलंग की तरफ देखने लगा लेकिन पलंग में मेरे और मेरे पत्नी के अलावा कोई नहीं था l मैं दुविधा में पड़ गया और इधर उधर देखने लगा, अरे - बच्ची कहाँ गई? मैंने पलंग के नीचे भी ढूंढा पर बच्ची नहीं मिली, कहीं भी बच्ची को  नहीं पाकर मैंने गुरूजी के तरफ नजरे घुमाई l 

पर ये क्या?

गुरूजी भी वहां नहीं थे, वे भी अंतर्ध्यान हो गए थे l सिर्फ अँधेरा ही अँधेरा नजर आ रहा था मैंने आँखों पर थोडा सा जोर लगाया और हाथ बढाकर बिजली का बटन दबाया l बल्ब की रोशनी से पूरा कमरा रौशन हो गया तब मैंने देखा की  की पलंग में मेरी गर्भवती पत्नी गहरी नींद में सोई है l 

तो क्या मैं जो देख रहा था वो एक सपना था?

फिर वो गुरूजी कौन थे? जिन्होंने मुझे उठाया और वत्स कहकर पुकारा? उन्होंने मुझसे क्यों कहा की पुत्री कहाँ है? क्या गर्भ में जो बच्चा है वह पुत्री है?  क्या ये मेरे पुत्री होने की भविष्यवाणी है? या क्या यह सिर्फ एक सपना था या मेरे मन की अनुभूति है? जो मुझे रात के सन्नाटे में सुनाई दिया?

ऐसे ही कितने सवालो का जवाब पाने के इंतजार में........



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Saturday, 3 November 2012

भाग्य


भाग्य

भाग्य को किस्मत, तक़दीर, मुक्कदर, नसीब आदि नामों से जानते है और अक्सर लोगों को कहते भी सुना है की उसके भाग्य में लिखा था इसलिए उसे मिला?, तुम्हारें भाग्य में नहीं लिखा है तो तुम्हें नहीं मिलेगा?, तुम्हारें भाग्य में जो लिखा है वही होगा?, तुम्हारें भाग्य में जितना लिखा होगा वही तुम्हें मिलेगा?, भाग्य से अधिक तुम्हें कुछ नहीं मिल सकता?, भाग्य से कोई लड़ नहीं सकता?,  भाग्य से लड़ना हमारें बस की बात नहीं है?, भाग्य कोई बदल नहीं सकता है ? इस प्रकार भाग्य के बारे में तरह-तरह के लोगों से तरह-तरह की बातें सुनने को मिलती है l

पर कभी आपने सोचा है की - 

आख़िरकार ये भाग्य है क्या ? जिससे अधिक हमें कुछ क्यों नहीं मिल सकता ? हमें जो मिलना है उसका निर्धारण पहले से कैसे कर लेता है? यह कैसे किसी के साथ जुड़ जाता है? यह कैसे बनता है ? क्या इसे बदला जा सकता है? हम कैसे इसे बदल सकते है? या फिर यह बदला ही नहीं जा सकता है ? क्यों यह बदला नहीं जा सकता है? इस तरह के न जाने कितने सवाल हमारें दिमाग में उठते है और हम भाग्य को जानने के लिए, भाग्य को बदलने के लिए मंदिरों में, दरगाहों में घुमते रहते है कभी-कभी पाखंडी बाबाओं के चक्कर में फंस कर अपना सब कुछ भी गवां बैठते है l और भाग्य की बिडम्बना तो देखो ईश्वर तो ईश्वर, अगर सदगुरुदेव सामने भी आ जाते है तो भी हम उन्हें पहचान नहीं पाते है और बिना किसी समाधान के निराश, निरुत्तर मौन होकर अपने भाग्य को कोसते रहते है l 

            ज्योतिष शास्त्र की माने तो भाग्य पूर्व जन्म का फल है, पूर्व जन्म में हमने जैसे-जैसे कर्म किये है उसी के अनुसार हमें फल मिलता है l इसको हम इस तरह से समझ सकते है मनुष्य का कर्म अर्थात मनुष्य का वर्तमानकाल जब व्यतीत होता है तो वह भुतकाल बन जाता है और उसी भूतकाल से भविष्यकाल का निर्धारण होता है l पूरी सृष्टि जैसे एक चक्र पूरा करता है उसी तरह मनुष्य का भाग्य चक्र भी वर्तमान काल से भुतकाल, भुतकाल से भविष्यकाल और भविष्यकाल से वर्तमानकाल तक घूमता रहता है l जब तक मनुष्य मोक्ष को प्राप्त नहीं कर लेता है, तब तक यह भाग्य चक्र निरंतर चलता रहता है, चलता रहता है l

इसका मतलब तो यह हुआ की कर्म प्रधान होता है l और कर्म से भाग्य बनता है, तब मन में प्रश्न यह उठता है की फिर एक बच्चा कैसे अमीर घर में जन्म लेता है तो एक बच्चा गरीब घर में जन्म लेता है, कोई अपंग होता है तो कोई जन्म लेते ही काल का ग्रास भी हो जाता है l और तो और बच्चा कैसे गर्भ में ही दम तोड़ देता है उन्होंने तो कोई कर्म किया ही नहीं होता है, तब किस आंकलन से निर्बोध बालक का भाग्य तय होता है फिर कैसे हम माने की कर्म से भाग्य का निर्माण होता है l

ये सच है की भाग्य के निर्माण में कर्म की भूमिका अहम् होती है पर केवल कर्म से ही भाग्य का निर्माण नहीं होता है वरन किसी भी भाग्य के निर्माण में उसके उसके माता-पिता और पूर्वजों के कर्मों का भार जुड़ने के साथ-साथ ही जनम लेते समय जिस वातावरण अर्थात उस समय की ग्रहों और नक्षत्रों की चाल से जिस परिस्थिति तंत्र का निर्माण होता है वह भी भाग्य के निर्माण में बहुत महत्वपूर्ण होता है l शाब्दिक अर्थों में हम अगर भाग्य को परिभाषित करें तो हमारे पूर्वजन्म के कर्मों और हमारे पूर्वजों के कर्मों और उस समय की ग्रहों एवं नक्षत्रों की चाल से जन्म लेते समय जिस वातावरण का निर्माण होता है उन परिस्थितिओं की गणनाएं ही हमारा भाग्य कहलाती है और जिसे हम अपने सदकर्मो और सदगुरुदेवजी के आशीर्वाद के द्वारा परिवर्तन कर सकते है l

सभी मनुष्यों के जीवन में भाग्य को सुधारने का, सवांरने का समय आता है परन्तु उसे वह माहौल नहीं मिल पाता और जब वह माहौल मिलता है तो अपने कर्म से भटक जाता है l उन्हीं सद्कर्म करने की इच्छाओं और माहौल का निर्माण तभी हो पाता है जब हम सदगुरुदेवजी के चरणों में अपने अहं को त्याग कर समर्पित हो जाते है, नतमस्तक हो जाते है और उनके आशीर्वाद और कृपा का पात्र बनते है अर्थात अपने भाग्य को सवांरने के लिए जीवन में सदगुरुदेवजी का आशीर्वाद होना परम आवश्यक है l


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Friday, 19 October 2012

बेवफा


बेवफा

हर पल तेरा नाम लिया मैंने l
  पल पल तुझे याद किया मैंने l l

पूछ लो सारी फिजाओं से,
रब से कितना फ़रियाद किया मैंने l

काँस महसूस कर सकते तुम सांसे मेरी ,
हर साँस को तेरे नाम से जिया मैंने l l

  हर आरजू तुमसे है पूरी हर ख्वाहिश तुमसे है जुडी मेरी,
तेरे ही प्यार के सपने मन में संजो लिया मैंने l

भूल न पाउँगा मैं तेरी मुस्कान कभी,
इस कदर तुमसे प्यार किया मैंने l l

हो सके तो खता बक्श देना मेरी,
शायद बहुत परेशान भी तुझे किया मैंने l

पर रास न आई तुझे पाक मोहब्बत मेरी,
जा बेवफा तुझसे नाता तोड़ लिया मैंने l l

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Tuesday, 16 October 2012

नवदुर्गा वंदना


नवदुर्गा वंदना 

आया आया आया ss..,  आया आया आयाss…,
देखो मैय्या भक्त तेरा आया ss.. 
मैय्या की भक्ति ले के, भक्ति की शक्ति ले के…
मैय्या द्वार, भक्त तेरा आयाss..
तू है मैय्या शैलपुत्री, सिद्द दात्री देवीss
तू है मैय्या चंद्रघंटा, कालरात्रि देवीss
तेरे नाम ले के मैय्या मैंने,
नवरात्री का दीप जलायाss आया आया आया ss..,  
दुखो को ब्रम्ह्चारिणी, तू है हरतीss,
खाली झोली महागौरी, तू है भरतीss,
सुखो का आँचल ओढाकर,
स्कन्दमाता, तू ही करती धुप को छायाss आया आया आया ss..,  
मैय्या कुष्मांडा, मेरा भी एक काम कर देss,
मैय्या कात्यायानी, भक्ति का दान कर देss,
संसार के मोह माया से छुटकारा दिलाकर,
रख दे मेरे सर अपने हाथो की छाया ss आया आया आया ss.., 
हे दुर्गसाधिनी तेरा ही आस है माँ,
हे दुर्गनाशिनी दूर होके पास है माँ,
हे दुर्गमेश्वरी तेरे है रूप अनेको ,
दुर्गभीमा, दुर्गा और कभी महामायाss आया आया आया ss.., 


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Monday, 1 October 2012

सपना हैं या अनुभूति -6


सपना हैं  या अनुभूति -6


रे भरे पेड़ों से पूरा जंगल सुशोभित हो रहा था और उन्हीं जंगलों के बीच पत्थरों की बड़ी बड़ी चट्टानें थी जिनको तोड़कर शायद सुरंग बनाया गया था l  ऐसा एक ही नहीं तीन चार द्वार दिखाई दे रहे थे l सामने बड़ा सा समतल मैदान आँगननुमा जान पड़ रहा था, उसी आँगन के एक किनारे में लकड़ी के एक चारपाई पर सफ़ेद वस्त्र पहने एक वृद्ध बाएं करवट में लेटे हुए थे l उन्होंने अपने गले में एक रुद्राक्ष की माला पहन रखी थी, उनके आँखों की चमक, चेहरे की ओज और कांतिमय शरीर से वे सदगुरुदेव लग रहे थे l उनके चारपाई के कुछ फासले पर ही मैं और मेरा एक सहपाठी पालथी मारे बैठे हुए थे, वे हमें कुछ ज्ञान की बातें बतला रहे थे l 

अचानक उन्होंने हमें आदेश देते हुए कहा - तुम दोनों खड़े हो जाओं l

हम दोनों ही उनके आदेश का पालन करते हुए तत्परता से खड़े हो गए, उन्होंने हाथ से सामने कुटिया की तरफ इशारा करते हुए कहा – वत्स ! जाओ वहां तुम दोनों के लिए कुछ रखा हुआ है l हम दोनों खुश  हो गए और प्रसन्नतापूर्वक दौड़ते हुए कुटिया के अन्दर चले गए l कुटिया के अन्दर हम दोनों ने पूरी निगाह दौड़ाई पर कुटिया खाली था, वहां हमारे लायक कुछ भी न था, हम मन में निराशा लिए वापस आ रहे थे की अचानक याद आया की कुटिया के दिवार में कुछ लटका हुआ था l हमने सोचा - कहीं वहीँ तो हमारे लिए नहीं है? हमने तय किया की कही गुरूजी उसी की बात तो नहीं कर रहे थे, इसलिए फिर से हम कुटिया के अन्दर आ गए l

देखा - दीवार पर दो तलवार लटकी हुई है, दिखने में दोनों तलवारें एक ही लम्बाई के, एक ही सामान दिखाई दे रहे थे l अंतर था तो सिर्फ रंग का एक लाल रंग का था,  एक सफ़ेद रंग का था, हम दोनों ने एक-एक तलवार उठा लिए l अगले ही पल हम दोनों के हाथो में एक-एक तलवार था मेरे हाथ में सफ़ेद रंग का और मेरे मित्र के हाथ में लाल रंग का तलवार सुशोभित होने लगा l हमने तलवार म्यान से खीच कर बहार निकाला तो देखा की जो म्यान लाल रंग का था उसका तलवार भी लाल रंग का है और जो म्यान सफ़ेद रंग का था उसका रंग भी सफ़ेद ही था l 

 हम तलवार हाथ में थामें गुरूजी के पास वापस आये l पर चारपाई खाली था, गुरूजी चारपाई में नहीं थे l हमने कुछ देर वहीँ प्रतीक्षा की लेकिन गुरूजी को गए काफी समय व्यतीत हो गया अब हमें और प्रतीक्षा करना मुश्किल हो रहा था l  हम उन्हें उन सुरंगनुमा कुटिया में तलाशने की कोशिश की पर वे हमें कहीं भी नहीं मिलें l  अब हम दोनों ने तय किया और उन्हें तलाशने के लिए अलग-अलग दिशाओं का चयन कर निकल पड़ें l हम गुरूजी को तलाशते हुए आगे बढ़ रहे थे और हमारा फासला भी बढ़ रहा था l

मैं गुरूजी के तलाश में बहुत आगे निकल आया, चारों तरफ नजरें दौड़ाया लेकिन कहीं भी गुरूजी दिखाई नहीं दे रहे थे l शायद वे हमें छोड़कर चले गए थे? शायद वे अंतर्ध्यान हो गए थे? और छोड़ गए थे कुछ अनसुलझे प्रश्न जैसे वह जगह कौन सी थी?  गुरूजी के वेश में वे कौन थे? हमें वे कौन सी शिक्षा दे रहे थे? मेरे साथ मेरा मित्र था वो कौन था? मेरे हाथों में सफ़ेद तलवार क्यों आई?  मेरा वह मित्र कहाँ गया? ऐसे ही न जाने कितने सवाल मेरे जहन में अब भी उठते है जिनका उत्तर ढुंढने की कोशिश में मैं अब भी भटक रहा हूँ l


गोकुल कुमार पटेल



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Friday, 28 September 2012

कविता


                                   कविता

मन में बह रही, विचारों की जो, उन्मुक्त सविता है l
उन्ही सच्चे अच्छे विचारों का, संग्रह ही कविता है ll

प्रेरणा का जो स्रोत है, दिल की जो उमंग है l
धडकनों की जो आवाज है, अन्तरंग की जो तरंग है ll

भले ही समाज में, धुंधला सा चेहरा ही इसकी छवि है l
पर यथार्थ से जो, अवगत कराये वही कवि है ll

समाज में प्याप्त, कुरीतियों की जो गन्दगी है l
उनकl निवारण करना ही, कविता की बंदगी है ll

अपनी ही बड़ाई लिखना, कविता पर सितम है l
क्योकि समाज की भलाई ही, कविता का माध्यम है ll

कविता का रूप तो, वास्तव में गद्य है l
अनेकता को एकता में लिखना ही पद्य है ll

जो दुखो से लड़कर, दूसरो के कल्याण लिए जीता है l
वही कवि और उसकी वाणी ही कविता है ll

कवि और कविता का, जो अनुपम मेल है l
वास्तव में वो तो शब्दों का खेल है ll


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Thursday, 27 September 2012

दीक्षा - गुरु वाणी


गुरुदेवजी का साक्षात्कार - I

दीक्षा - गुरु वाणी


            सदगुरुदेवजी का ये आशीर्वाद ही था की मुझे परम पूज्य गुरुदेव आचार्य श्री तेजसिंह जी राजावत (निखलेश) जी से साक्षात्कार करने का मौका मिला, उनको जानने का मौका मिला और ये उनकी विशाल ह्रदय की महानता ही तो थी की मैं उनके श्री चरणों में बैठ कर उनका सानिध्य प्राप्त कर सका l जीवन में दीक्षा के महत्त्व को समझ सका l उन्होंने दीक्षा पर प्रकाश डालते हुए कहा था की वैसे तो सृष्टि के समस्त चर-अचर, जीव-जंतुओं का सृजन और संहार परम ब्रम्हा परमेश्वर के आशीर्वाद से होता है, लेकिन इस भू-मंडल में मनुष्य जीवन के उत्त्पत्ति का आधारशिला माता-पिता पर निहित होता है l या यों कहे की हमारे जीवन की उत्त्पत्ति माता-पिता की देन होती है l

            मनुष्य जन्म लेता है और जन्म लेते ही सभी क्रिया कलाप करने लग जाता है खाना खाने लग जाता है, सबको पहचान लेता है की ये मेरे माता-पिता है, दादा-दादी, भाई-बहन, चाचा-चाची है, ये मेरे दोस्त है, वह दोस्तों के पास जाकर खेलने लगता है, पुस्तक पकड़ कर पढ़ने चला जाता है, सामर्थवान बनकर जीवनयापन करने लगता है l 

ऐसा होता है क्या?

नहीं न?

ऐसा नहीं होता है ?

क्योंकि?

ऐसा संभव ही नहीं है l

     मनुष्य का जन्म तो हो जाता है पर मनुष्य एक बेजान लाश की तरह पड़ा रहता है धीरे-धीरे वह बड़ा होता जाता है, जानने लगता है, समझने लगता है, पहचानने लगता है l परिवार का, समाज का, देश का, ऋणी होकर शिक्षा प्राप्त करने लगता है l जैसे-जैसे ये बड़ा होकर समाज में रहने लायक हो जाता है और अपने परिवार के दायित्त्वों का पालन करने लगता है, अपने आप में इतना खो जाता है की वह समाज, देश, संस्कृति, आध्यात्म और ईश्वर को भूल जाता है l उनके उन ऋणों को भूल जाता है, जिनको प्राप्त कर वह इस लायक बना है l उन का बोझ, उन का पाप उसके मन को विचलित कर देता है और वह कई प्रकार के अनजानी विपत्तियों, बिमारियों से घिर जाता है l जो कुछ भी वह प्राप्त किया रहता है सब नष्ट हो जाता है या सब कुछ होते हुए भी वह संताप करने लगता है l कभी व्यर्थ की चिंताएं, तो कभी मौत की चिंताएं मन को सताने लगती है, मनुष्य के मन में अपने आप का, अपने परछाई का डर व्याप्त हो जाता है l
  

            तब गुरु दीक्षा ही जीवन को एक नया मोड़ प्रदान कर सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है जिससे मनुष्य मोह, माया, जाति, उंच-नीच आदि का भेद त्याग कर अपनत्व को अंगीकार कर लेता है l सर्व जन हिताय, सर्व जन सुखाय ही उसका उद्देश्य हो जाता है l वह समाज के, देश के सुख में सुखी होता है और दुःख में दुखी होता है l वास्तव में देखा जाये तो जीवन का प्रारंभ यही से (दीक्षा से) ही होता है व्यक्ति को पूर्णत्व प्रदान करने की इसी दुर्लभ प्रक्रिया का नाम ही दीक्षा हैं l 


            दीक्षा से ही मनुष्य में आध्यात्मिक शक्ति का विकास होता है, सात्विक गुणों को प्राप्त कर वह अँधेरे से उजाले की ओर अग्रसर होने में सक्षम हो पाता है और जब वह गुरु को आत्मसात कर लेता है तो वह सभी प्रकार के ऋणों से मुक्त होकर परम ब्रम्हा को प्राप्त कर लेता है, मोक्ष को प्राप्त कर लेता है l इसलिए यथा संभव गुरुचरणों में बैठ कर हर इन्सान को गुरु दीक्षा लेनी ही चाहिए l


गोकुल कुमार पटेल



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Tuesday, 4 September 2012

सपना हैं या अनुभूति -5



सपना हैं या अनुभूति -5

        
     आज मौसम कितना सुहाना लग रहा हैं , क्या आज कोई त्यौहार हैं ? अपने दिमाग पर जोर लगाया तो जबाब मिला - नहीं? नहीं तो?

            हर तरफ फिर आनंदमय का माहौल क्यो हैं, सब के सब गलियों की सफाई में जुटे हुये हैं, मेरे घरवाले भी उन्हीं में शामिल हैं  मैने एक दो बार पुछने की कोशिश भी की, कि ये सब क्यों हो रहा हैं ? आज कौन सा त्यौहर हैं? या ये सब सफाई का क्या कारण हैं? पर सभी काम में  इतने ब्यस्त थे कि उन्हें बात करने की भी फुरसत नही थी।

           मैं भी काम में हाथ बटाने लग गया ताकि इसी बहाने पुछ सकूँ की आज क्या हैं पर मेरी सारी कोशिश बेकार गई l  सभी ने सिर्फ मुस्कुराकर ही मेरे सवालों का जबाब दे दिए और मैं निरुत्तर, थककर एक किनारे रखे हुए टेबल पर बैठ गया l अचानक मेरी नजर ले जा रहे बड़े-बड़े चित्र पर पड़े l मैं चौकन्ना हो गया l  मेरे होंठों पर मुस्कान दौड़ पड़ी, मन मुझसे कहने लगा की  जिसके लिए मैं इतना कोशिश कर रहा था वो तो सामने हैं l जरुर इनमें चित्र होंगे और उन चित्रों को देखकर सहज ही पता चल जायेगा की कौनसा समारोह होने वाला है l किसलिए ये सब तैयारियां है या फिर कौन आने वाला है l 
            
          मैं लपककर उन चित्रों की तरफ भागा पर ज्यों ही मेरी नजर उन चित्रों पर पड़ी, मन व्याकुल हो गया क्योकि एक चित्र में तो बड़े-बड़े हरे-भरे पर्वत श्रृंखलाओं का चित्र बना हुआ था तो दुसरे में ब्रम्हांड के सारी शक्तियों को चित्रांकित किया गया था l  उन चित्रों ने मुझे परेशानी में डाल दिया था मैं समझ नहीं पा रहा था की इन चित्रों का क्या मतलब है, आख़िरकार मन में एक विचार आया की हो न हो ये आध्यात्म से जुड़ा कोई कार्यक्रम है, और इसमें कोई महापुरुष का आगमन होने वाला हैl  ये सब सोचकर मैं जल्दी से तैयार होने के लिए, कुछ कपडे लेकर नहाने के लिए तालाब पहुँच गयाl  कपडे किनारे रखा और तालाब की तरफ डुबकी लगाने चल पड़ा पर मैंने ज्यों ही कदम आगे बढाया सामने देखकर मैं सन्न रहा गया, देखा की दाए तरफ तालाब के सीढ़ी के बगल में एक पीले रंग का छोटा नाग बिल से निकल कर मेरे तरफ ही आ रहा है पर मुझे तो नहाने की जल्दी थी उसको अनदेखा करके मैंने तालाब में जाने के लिए कदम बढ़ा ही दिया पर क्या देखता हूँ की नीचे भी एक काले पीले रंग का धारी युक्त एक सांप सामने से ही मेरा रास्ता काट रहा है मेरा मन विचलित हुआ जा रहा था और मैं बार बार कभी इधर तो कभी उधर देखा रहा था और सांप है की मेरे तरफ ही आ रहे है l 

          मैं डर के मारे कांपने लगा और कुछ पल के लिए आँखें बंद कर ली, पर नाग की फुन्फकार मेरे कानो तक आकर मुझे डरा रही थी, धीरे-धीरे फुन्फकार की आवाज तेज हो रही थी l मैं डर से कांप रहा था और उसी डर ने मुझे आँखे खोलने पर मजबुर कर दिया l और जब मैंने आँखे खोली तो देखा – चारो तरफ अँधेरा ही अँधेरा छाया हुआ  है, लेकीन फुन्फकार की सरसराहट अब भी आ रही है l मैंने आँखों पर जोर दिया और देखने की कोशिश करने लगा तो पाया की सामने छत पर लटकता हुआ पंखा घूम रहा है l और उसकी सरसराहट मेरे कानो से टकराकर फुन्फकार सा प्रतीत हो रहा था l कुछ देर तक मैं यूँ ही पंखे को देखता रहा और सोचने की नाकाम कोशिश करता रहा l

        न जाने ये सपने कहाँ- कहाँ से आ जाते है और पता नहीं ये भविष्य के किन-किन घटनाओं से जुड़े होते है l कहीं ये सपना भी मुझे भविष्य की किन्ही घटनाओं से अवगत तो नहीं करना चाह रही है? हरे-भरे पर्वत श्रंखला का तात्पर्य क्या है? ब्रम्हांड की शक्तियों को क्यों चित्रांकित किया गया था? वहां कौन सा कार्यक्रम होने वाला था? पीले नाग का क्या मतलब है? काले-पीले रंग का वह सांप मेरा रास्ता क्यों रोक रहा था? मैं आगे बढ जाता तो क्या होता? इन सब सवालों का जबाब तो मैं नहीं जानता? पर ये महसूस जरुर होता है की आने वाले दिनों में इन सवालों का जबाब खुद ब खुद मेरे सामने आ जायेंगें l 


गोकुल कुमार पटेल



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Dream or sensibility -5

          
           Today's weather looks so amazing, what's a festival today? So put your mind got your answer - no? Not so?
            
             Why are the delightful atmosphere of each side; There are all involved in the cleaning of streets, My family also includes those I tried to ask a couple of times, why is all this happening? Which is a festival today? Or what causes all this cleaning? Were so busy at the work that was not too busy to talk to them.

             I also took a diversion so that the hand could ask the same excuses what are today; all my efforts were wasted on. He only smiled and gave the same answer all my questions and silence, tired and sat down at the table, keeping an edge. Suddenly my eyes are going to get bigger lying on the big picture. I became alert.

             The smile on my lips was running, the mind says to me, for which I was trying to do before her.

            Definitely seeing these pictures and those pictures will know instinctively what is going to function. It is now in preparation for what is to come, or who. I ran towards those pictures to rush as soon as my eye fell on the pictures,  Mind was disturbed because the picture so big - big green - lush mountain ranges when the portrait was painted in another universe powers. Those pictures put me in trouble, I did not understand what these images mean, after all do not have an idea in mind, and it is no program associated with spirituality and having a master's arrival is.

            They all think I have to be ready soon; some clothes reached the pond for bathing. Placed along the sides of the cloth and dip pool was a step forward, but I soon became a mother I'm numb, Seen on the lake right next to the ladder a little yellow snake is coming towards me out of bill, But I was quick showers; I ignore him and go to step towards the pond,
What to see black snake with yellow stripe down the front path is cut from the same mine, My mind was being distracted and I looked again there was ever here sometimes and the snake is coming towards me.
           
             I started shivering with fear and have eyes for a few moments, the hiss of the serpent was scaring me come to my ears, gradually intensified was hissing. I was trembling with fear and that fear made ​​me helpless eyes open. And when I saw opened eyes - dark shadow is darkness all around, but still there is the rustle of hiss. I focused on the eyes and began to try to see hanging on the ceiling in front of the fan is spinning. Hiss and rustle which would seem to run over my ears. For a while, I just looked at the fan failed and been trying to think.

            Do not let these dreams where - where do they come from and I do not know what the future - which is linked to the events. Somewhere I have this dream of the future seems to be not aware of any events?  Green - green mountain range is means?  Why was drawn to the powers of the universe?  Which program was going to be there?  What is the yellow snake? Black - yellow snake that was my way, why stop? What happens if I go ahead?  I do not know the answer to all these questions? But this feeling is definitely answering these questions in the coming days before my eyes shall be accepted automatically.


Gokul Kumar Patel



Saturday, 18 August 2012

सपना है या अनुभूति - 4


सपना है या अनुभूति - 4


गॉव में चारों तरफ बड़ी चहल पहल लग रही थी सभी लोग इधर से उधर भागे जा रहे थे मैंने एक लडके को रोक कर पूछा- क्या हुआ ? कहाँ भागे जा रहे है सब? लडके ने तत्परता से भागते हुए कहा- गॉव के बाहर जो पीपल का पेड़ है न ? वहां पर एक साधु बाबा आये हुए है बहुत पहुँचे हुए है देखते ही सब कुछ बता देते है l

जब मैंने ये सुना तो मन में कई तरह की जिज्ञासाएं उठने लगी l  और उन जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए मैं भी बाबा से मिलने पहुँच गया l  देखा चारों तरफ बहुत भीड़ है लोगों ने पुरे पीपल के पेड़ को घेर रखा है l मैं भी उसी भीड़ में शामिल हो गया और भीड़ को चीरते हुए जब पेड़ के पास पहुचां तो देखा - सफ़ेद बाल, सफ़ेद दाढ़ी युक्त सवांले से एक वयो बृद्ध छोटी से गेरुआ रंग की धोती और छोटा सा गमछा ओढ़े हुए बैठे है l  सभी उनको नतमस्तक होकर प्रणाम कर रहे थे l  उनके चहरे में गजब का आकर्षण था जिसने मुझे नतमस्तक होने पर मजबूर कर दिया l

मैंने आदर पूर्वक उन्हें प्रणाम किया तो बाबा मुस्कुराते हुए बोले - खुश रहो वत्स ! बताओं मंदिर का काम कैसा चल रहा है l मेरी नजर अगल बगल झांकने लगी की ये किसी और को तो नहीं बोल रहे है पर मेरे पास कोई नहीं थे मैंने असमंजता जताते हुए कहा - मुझे कह रहे है?

हाँ वत्स - उनके चेहरे में वही मुस्कान थी l

पर मैं तो कोई मंदिर नहीं बना रहा हूँ – मैंने उसी असमंजता से जबाब दिया l

अच्छा अच्छा तो फिर मकान बना रहे हो - बाबा ने बात बदलते हुए कहा l

मुझे उनकी बातें उलझा रही थी मैंने उलझन से निकलते हुए बोला - ये क्या? मन में जो आया वो बोले जा रहे है? मैं कोई मकान, मंदिर नहीं बना रहा हूँ?

फिर नींव किसके लिए डाली है - बाबा बोले l

वो - वो तो छोटा सा दीवाल टूट गया था उसके लिए खोदा है पर खोद तो दिया है लेकिन मेरे पास इतने ईट पत्थर नहीं है की वह दीवाल भी उठ सकें और आप मकान की बातें कर रहे है l

नींव तो डाल दी है न अब तो मंदिर बन जायेगा - बाबा ने बातों को दोहराते हुए कहा l

अब उनकी बातें मुझे गुस्सा दिला रही थी मैंने झल्लाते हुए कहा - कितने बार कहू आपसे की मैं कोई मंदिर नहीं बना रहा हूँ, मकान नहीं बना रहा हूँ l आपकी समझ में ये बात क्यो नहीं आ रही है l नींव डाल दिया बोल दिया तो बहाना मिल गया? सोच रहें होंगे की वैसे नहीं तो ऐसे तो फंसा लूँगा? और दान दक्षिणा मिल जायेगा l कुछ नहीं आता है तो बोल दो न की नहीं आता है इस तरह से पाखंड रचकर लोगों को लूटने का धंधा बना लिया है l आप जैसे लोग ही साधू, महात्मा को बदनाम कर रहे है l एक ही साँस में मैंने अपना सारा गुस्सा उन पर उतार दिया और उनको बुरा भला कहते वहां से चला आया l

कुछ ही दूर आया था की रास्ते में मुझे गुरूजी के दर्शन हो गए l मैंने गुरूजी को प्रणाम किया l मेरे चेहरे के भावों समझ गए थे शायद इसलिए आशीर्वाद देते देते मुस्कुराते हुए बोले - क्या हुआ वत्स! किस पर बिगड़ रहे हो?

वो जो पीपल के पेड़ के पास एक संत आये है न उनके ऊपर , अरे काहे का संत? बेवकूफ बना रहे है सबको, हमारे घर के  सामने का छोटा सा दीवाल टूट गया था न? उसको उठाने के लिए नींव खोदा है l कब से जैसे का जैसा पड़ा है देख लिया होगा l उसके लिए मुझे कहता है नींव डाल दिया है, मंदिर बना रहे हो की मकान बना रहे हो?

अब आप ही बताइए - कहाँ पांच फुट का दीवाल, कहाँ मकान और कहाँ मंदिर l उतने छोटे से दीवाल में मकान बनेगा की मंदिर बनेगा? 

गुरूजी मंद मंद मुस्कुराते हुये बोले -  इसमें गुस्सा करने वाली बात कहाँ है वत्स! सही तो कहा उन्होंने?

मेरा भी तो यही सवाल है वत्स! मै भी तुमसे यही पुछने वाला था कि मंदिर बनाओगें की मकान बनाओगें l

उनके बातों को सुनकर मैं अचरज में पड़ गया और मेरे चारों तरफ सन्नाटा हो गया और उस सन्नाटे ने मेरी तनिंद्रा भंग कर दी l मैंने आँखें खोल दी तो पाया की मैं पलंग पर लेटा हुआ हूँ और सचमुच सभी तरफ सन्नाटा ही सन्नाटा है पर उनकी ये बातें अब भी मेरे कानों में गूंज रही थी की मंदिर बना रहे हो की मकान बना रहे हो?

सुबह मैने सपने मे देखे हुये दिवाल का मुयैना किया किसी भी तरह से वह जगह न तो मकान बनने लायक था न ही मन्दिर बनने लायक ही था फिर बाबा ने ऎसा क्यो कहा? वो बाबा कौन थे? गुरुदेवजी ने भी ऎसा क्यो कहा? वे मुझे किन बातो का एहसास करा रहे थे? मकान व मन्दिर मे क्या अन्तर है? ये सारे सवालो के जबाब मुझे समाज के प्रति अपने कर्तब्यो का बोध कराते है, क्या ये सही है? क्या मै समाज के प्रति अपने कर्तब्यो का भलीभान्ति निर्वाहन कर पाउँगा? क्या मै समाज को एक नई दिशा दे पाउँगा? 

इन्ही प्रेरणाओ को जीवन मे उतारने की एक कोशिश में……………

            गोकुल कुमार पटेल  

(इन रचनाओ पर आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए मार्गदर्शक बन सकती है, आप की प्रतिक्रिया के इंतजार में l)



DREAM OR SENSATION - 4

Village was looking around all the hustle and bustle of people were running here and there I asked the guy to stop - what happened? Is where are you running? The shy boy promptly said - Village People outside of the tree is not it? There has been a lot of sage has reached the view that everything is just.
When I heard that many of the queries raised in the mind,
And to defuse the queries I got to meet Baba l saw a crowd of people around the trees, laid siege to the entire People.
White hair, white beard, an elderly Swanle containing small orange-colored dhoti and a small sitting wrapped in bandannas. They bow their heads bowed and their faces were all the wonderful things that I was forced to bow their heads.
I humbly bowed to the sage said, smiling - happy Watts! Tell me how is the work of the temple began to look around you to see if they are not talking to anyone else but I have none expressed dilemma said - I are saying is
Yes Watts - his face was the same smile .
But I am not making a temple - I answered the same dilemma.
So the houses are well built - Baba's changing the.
I was confused and out of the things I said was confusing - what is this? Came to mind that they are talking? I have no house, the temple is not?
For whom the foundation is laid - Baba said,
She - she dug for him a small wall was broken
You have to dig, but I've got to get up and eat the stone wall of the house are the things that you.
So do not put the foundation will now become the temple - Baba reiterated the points.
Now the things I was aggravating, Rattling I said - how many times you say I'm not a temple,
  I am not making house, You can not understand why it's. Have laid the foundation said it was the excuse? Will be thinking of the way so that you'll get caught? will give alms and donations.
If something does not speak or do not, The hypocrisy of the arguments people have made the business of rob. People like you saints, are infamous for Mahatma.In the same breath I take your anger on them and abuse them came from the.
Some came away in the way that I have visions of master. I bowed to the Guru, My facial expressions were understood. Maybe give the blessing with a smile and said - what Watts! What are the worse?
People who are not their top of the tree came a saint, a saint oh why? Making a fool of everyone, a small wall in front of our house was broken right? He dug the foundation for taking such a long. l like to have seen tells me it has laid the foundation, the temple are made ​​of the houses are built?
Now you tell me - where five feet of the wall, where many small houses and where the temple. temple wall of the house will be?
Dim-dim priest said while smiling - that's where the anger Watts! Right then did he say?
Watts I also have the same question! I was you, the inquiry, the temple houses Bnaogen Bnaogen.
Listening to the things I had to wonder and silence was all around me, The silence broke my Tnindra.  Opened my eyes when I found I was lying on the bed and indeed all the silence is the silence
These things, he was still buzzing in my ears are the temple of the houses are built?
I had seen in dreams Muyana day to be pointing in any way to the house was worth neither the place nor the Baba temple was worthy of being called so, why? Those who were Baba? It also said Gurudevji Why? What are the things I felt they were? What is the difference between house and temple? I answer all these questions is to make society aware of his obligation, is that right? Of their obligation to society what I'd been handling well? What I'd give the society a new direction? In an attempt to bring these inspirations in life ...............

Gokul Kumar Patel