Thursday, 3 August 2017

दो जून की रोटी

दो जून की रोटी
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आज फिर निकल पडा़ हूँ मैं, अपनी शक्ति आजमाने को,
दुनिया को मेरे होने का एहसास दिलाने को,
अपना और अपने परिवार का अस्तित्व बचाने को।
आज फिर निकल पड़ा हूँ मैं, दो जून की रोटियां कमाने को।

छोड़ कर घर-परिवार, छोड़ कर सारे रिश्ते नातों को,
छोड़ कर बीबी के अधर पर अटकी, अनकही बातों को।
छोड़ कर बच्चों की मुस्कान, लडकपन औऱ शरारतों को,
छोड़कर सुख-दुख से जुडी पल, पल से बनी दिन, रातों को।
आज फिर निकल पड़ा हूँ मैं, दो जून की रोटियां कमाने को।

उसी जज्बे, उसी हौसले से अपनी हुनर दिखाने को,
छलकती माथे की बूंदो से, अपनी किस्मत बनाने को।
तृप्ति की चाह में, अतृप्ति पेट की आग बुझाने को,
आज फिर निकल पड़ा हूँ मैं, दो जून की रोटियां कमाने को।

चीरकर धरती का सीना, उपजाऊ बनाने को,
खोदकर पर्वत, पहाड़ अमृत धारा बहाने को।
नन्ही-नन्ही बीजों से, लहलहाती फसल उगाने को,
आज फिर निकल पड़ा हूँ मैं, दो जून की रोटियां कमाने को।

नम मिट्टी को, पत्थर सा सख्त ईट बनाने को,
ईट से दीवार, दीवार से घर बनाने को।
सपनों के रंगों से, हर दरो दीवार सजाने को,
आज फिर निकल पड़ा हूँ मैं, दो जून की रोटियां कमाने को।

रेशम से धागा, धागे से कपड़ा बनाने को,
तन के संग-संग मन के विचारों को छिपाने को।
घूंघट ओढा़कर, सुंदर मूखडे पर चार चाँद लगाने को,
आज फिर निकल पड़ा हूँ मैं, दो जून की रोटियां कमाने को।
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गोकुल कुमार पटेल

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