Thursday, 8 December 2011

ठंड आ रही है


ठंड आ रही है

वर्षा बीती ठंड आ रही है
जगह जगह से चुनावी गंध आ रही है
पुराने से पुराना कपड़ा भी अब सिल जायेगा
हर चौक चौराहे पर, मशाल थामे
घुसपैठियों का प्रतिनिधित्व मिल जायेगा
कही पर ओले पड़ेगें, कहीं पर कोहरा होगा
कहीं पर शतरंज की बिसात होगी
कहीं पर चाल दोहरा होगा
महंगें से महंगा अब गर्मी चाहिए
नंगे नाच नाचने वाला बेशर्मी चाहिए
ढक जायेगा तन कपड़ों से
सिहर जायेगा समाज दंगों और लफड़ों से
बच नहीं पायेगा कोई भी,
इसके कसते शिकंजे से
कोई छुड़ा नहीं पायेगा,
अपने आपको चुनावी पंजों से
सुन्न हो जायेगा तन, हाथ पैर ठिठुर जायेंगें
कही पर शकुनि होगा, कही विदुर कहलायेगें
भ्रष्टाचार चादरों में बंद आ रही है
चुपके से दबे पांव महाभारत की जंग आ रही है


(इन रचनाओ पर आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए मार्गदर्शक  बन सकती है, आप की प्रतिक्रिया के इंतजार में l )
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