Monday, 19 June 2017

अधूरी आस













अधूरी आस
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तेरी खूबसुरती ही नहीं,
तेरी हर अदा ही मुझे प्यारी लगती है।
तेरे हुश्न की तारीफ मैं क्या करूँ,
तु मुझे चाँद से भी न्यारी लगती है।।
अब भी हर पल,
तेरे आने का इंतज़ार रहता है।
अब भी तुमसे,
बात करने को दिल बेकरार रहता है।।
ये जानते हुए कि,
ये सब अब सिर्फ खयाली बातें है ।
सच्चाई है तो बस इतना कि,
इस जीवन में अब, चंद ही मुलाकातें है।
अब न तु मुझे मिलेगी, अब न मैं तुम्हें मिलूँगा।
बिन धडकन के ये साँस चलेंगी,
अब बिन साँसो के ये जीवन जी लूंगा।
सब कुछ बदल चूका है, मौसम की करवटों से,
अधरो पर फिर भी कोई बात रुकी है।
जबकि मैं किसी और का हो चुका हूँ,
तु किसी और की हो चुकी हैं।
फिर ये तडप क्यों है, ये प्यार क्यों हैं।
तेरे आने का अब भी इंतज़ार क्यों है।
कैसे समझाऊँ इस दिल को,
ये मानता ही नहीं।
कहता हैं तु कभी पराई हो नहीं सकती,
तु तो अब भी जान हमारी लगती हैं।

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गोकुल कुमार पटेल

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Friday, 16 June 2017

एक अबोध बच्चा



एक अबोध बच्चा
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एक अबोध बच्चा, मन का कच्चा।
कैसे सीख लेता है,  खाना, पीना, सोना।
लोग कहते है प्रकृति है,
मुझे लगता है तृप्ति है।
प्यास और भूख का, शरीर के सुख का।

एक अबोध बच्चा, मन का कच्चा।
कैसे सीख लेता है, रोना, धोना, हंसना।
लोग कहते है प्रकृति है,
मुझे लगता है वृत्ति है।
मन के व्याकुलता का, हृदय के अनुकूलता का।

एक अबोध बच्चा, मन का कच्चा।
कैसे सीख लेता है, उठना, बैठना, चलना।
लोग कहते है प्रकृति है,
मुझे लगता है प्रवृत्ति है।
मनुष्य समाज का, समाज के विकास का।

एक अबोध बच्चा, मन का कच्चा।
कैसे सीख लेता है, खेलना, कूदना, दौडना।
लोग कहते है प्रकृति है,
मुझे लगता है वृद्धि है।
दिल के उमंग का, शरीर के हर अंग का।

एक अबोध बच्चा, मन का कच्चा।
कैसे सीख लेता है, तोडना, फोडना, जोडना।
लोग कहते है प्रकृति है,
मुझे लगता है कृति  है।
व्याग्रता, द्वेष, क्रोध का, विकारों के विरोध का।

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गोकुल कुमार पटेल


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