Tuesday, 6 December 2011

इंतजार की घडी थी


                    इंतजार की घडी थी

दिन ढल गया था, शाम ढल गया था,
रात के आगोश में ठण्ड बहुत लग रही थी l
मैं स्वेटर के पीछे दुबका,
एकांत रास्ते पर जा रहा था,
जल्दी था मुझको,
पर बहुत दूर अभी चौराहा था l
सुनसान सडको पर,
चौराहे से होकर जाना पड़ता,
जाना जरुरी था,
इसलिए मरता क्या न करता l
नजर उठाकर चौराहे को देखा तो,
एक लड़की वहां खड़ी थी l
दुल्हन के जोड़े में लिपटी,
सचमुच हुश्न की वो परी थी l
हल्की ठंडी हवा के झोकों से,
उसके रेशमी बाल लहरा रही थी l
ये काली रात शायद उसके,
जुल्फ लहराने पर बनी थी l
मांथे पर बिंदिया ऐसा चमक रहा था l
जिससे मुझे दो दो चाँद का आभास हो रहा था l
आँचल का झिलमिलाना,
तारों की लुका छुपी लग रही थी l
दूर से देखा था उसने शायद मुझे,
तो एक पल के लिए मुस्कुरा ही पड़ी थी l
मैं भी मन ही मन अपने रूप रंग,
सुन्दरता पर गर्व कर रहा था l
कई सपने संजो लिया था मन में,
पर सब्र कर रहा था l
जैसे जैसे मैं पास जा रहा था,
वो आश्चर्य से मुझे देख रही थी l
शायद मैं वो नहीं था,
जिसके लिए वो वहां खड़ी थी l
मेरे सारे अरमां बिखर गए थे,
मैं निराश प्रेमी सा लग रहा था l
वो सर को झुकाए थी,
गम में भी मैं मंद मंद मुस्कुरा रहा था l
मैं अपने रास्ते जा रहा था,
और वो खामोश ही खड़ी थी l
वो काली रात शायद, उसके लिए,
इंतजार की घडी थी l


(इन रचनाओ पर आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए मार्गदर्शक  बन सकती है, 
आप की प्रतिक्रिया के इंतजार में l )
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