Thursday, 3 August 2017

दो जून की रोटी

दो जून की रोटी
----------------------



आज फिर निकल पडा़ हूँ मैं, अपनी शक्ति आजमाने को,
दुनिया को मेरे होने का एहसास दिलाने को,
अपना और अपने परिवार का अस्तित्व बचाने को।
आज फिर निकल पड़ा हूँ मैं, दो जून की रोटियां कमाने को।

छोड़ कर घर-परिवार, छोड़ कर सारे रिश्ते नातों को,
छोड़ कर बीबी के अधर पर अटकी, अनकही बातों को।
छोड़ कर बच्चों की मुस्कान, लडकपन औऱ शरारतों को,
छोड़कर सुख-दुख से जुडी पल, पल से बनी दिन, रातों को।
आज फिर निकल पड़ा हूँ मैं, दो जून की रोटियां कमाने को।

उसी जज्बे, उसी हौसले से अपनी हुनर दिखाने को,
छलकती माथे की बूंदो से, अपनी किस्मत बनाने को।
तृप्ति की चाह में, अतृप्ति पेट की आग बुझाने को,
आज फिर निकल पड़ा हूँ मैं, दो जून की रोटियां कमाने को।

चीरकर धरती का सीना, उपजाऊ बनाने को,
खोदकर पर्वत, पहाड़ अमृत धारा बहाने को।
नन्ही-नन्ही बीजों से, लहलहाती फसल उगाने को,
आज फिर निकल पड़ा हूँ मैं, दो जून की रोटियां कमाने को।

नम मिट्टी को, पत्थर सा सख्त ईट बनाने को,
ईट से दीवार, दीवार से घर बनाने को।
सपनों के रंगों से, हर दरो दीवार सजाने को,
आज फिर निकल पड़ा हूँ मैं, दो जून की रोटियां कमाने को।

रेशम से धागा, धागे से कपड़ा बनाने को,
तन के संग-संग मन के विचारों को छिपाने को।
घूंघट ओढा़कर, सुंदर मूखडे पर चार चाँद लगाने को,
आज फिर निकल पड़ा हूँ मैं, दो जून की रोटियां कमाने को।
_______________________________

गोकुल कुमार पटेल

(इन रचनाओ पर आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए मार्गदर्शक बन सकती है, आप की प्रतिक्रिया के इंतजार में ।)

Thursday, 6 July 2017

मेरा गांव बदल गया

मेरा गांव बदल गया
------------------------------

कल कारखानों के निर्माण से, पीपल का छाँव बदल गया।
सचमुच समाज के नव निर्माण में, मेरा गांव बदल गया।।

वृक्षों के कटने से, चिडियों के बसेरे बदल गये।
चिडियों की चहचहाट भरी वो सबेरे बदल गये।।

ताजगी भरी सुबह की ताजी-ताजी हवा बदल गयी।
ममत्व और दुलार से पुकारती माँ की तवा बदल गयीं।।

सडक के निर्माण से गली बदल गयीं रास्ते बदल गये ।
पैकेटबंद खानो से सुबह के पौष्टिक नाश्ते बदल गये।।

नल के लगने से सत्कार करती पनीहारन की कुआं बदल गयी।
चिमनियों के लग जाने से आकाश की धुआं बदल गयी।।

ईट पत्थरों के जुडने से घर और मकान बदल गये।
दिखावेपन में भईया और काका के पहचान बदल गये।।

लहलहाती फसलों के सारे खेत खलिहान बदल गये।
पैसो के खनक से सारे रिश्तों के ईमान बदल गये।।

वो तालाब बदल गयीं, वो नदी नाले बदल गये।
रक्षक बन अडिग रहने वाले हिम्मत वाले बदल गये।।

मन को हर्षाति बागों के सारे फुल और बेल बदल गये।
उछल कूद करने वाले बचपन के सारे खेल बदल गये।।

कुंठित बुद्धि से हमारे सारे सांस्कृतिक त्योहार बदल गये।
अपनत्व से गले लगाने वाले दोस्त, यार बदल गये।।

मन को शांति देने वाले राम कृष्णा के भजन बदल गये।
आधुनिकता से वास्तव में सारे धरती, गगन बदल गये।।

भ्रष्टता में सनकर जीवन के पासो का हर दाँव बदल गया।
गोकुल कहे नवनिर्माणों से सच में मेरा गांव बदल गया।
___________________________________


गोकुल कुमार पटेल


(इन रचनाओ पर आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए मार्गदर्शक बन सकती है, आप की प्रतिक्रिया के इंतजार में ।)

Monday, 19 June 2017

अधूरी आस













अधूरी आस
-----------------

तेरी खूबसुरती ही नहीं,
तेरी हर अदा ही मुझे प्यारी लगती है।
तेरे हुश्न की तारीफ मैं क्या करूँ,
तु मुझे चाँद से भी न्यारी लगती है।।
अब भी हर पल,
तेरे आने का इंतज़ार रहता है।
अब भी तुमसे,
बात करने को दिल बेकरार रहता है।।
ये जानते हुए कि,
ये सब अब सिर्फ खयाली बातें है ।
सच्चाई है तो बस इतना कि,
इस जीवन में अब, चंद ही मुलाकातें है।
अब न तु मुझे मिलेगी, अब न मैं तुम्हें मिलूँगा।
बिन धडकन के ये साँस चलेंगी,
अब बिन साँसो के ये जीवन जी लूंगा।
सब कुछ बदल चूका है, मौसम की करवटों से,
अधरो पर फिर भी कोई बात रुकी है।
जबकि मैं किसी और का हो चुका हूँ,
तु किसी और की हो चुकी हैं।
फिर ये तडप क्यों है, ये प्यार क्यों हैं।
तेरे आने का अब भी इंतज़ार क्यों है।
कैसे समझाऊँ इस दिल को,
ये मानता ही नहीं।
कहता हैं तु कभी पराई हो नहीं सकती,
तु तो अब भी जान हमारी लगती हैं।

-------------------------------------------------

गोकुल कुमार पटेल

(इन रचनाओ पर आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए मार्गदर्शक बन सकती है, आप की प्रतिक्रिया के इंतजार में।)

Friday, 16 June 2017

एक अबोध बच्चा



एक अबोध बच्चा
---------------------------------------------

एक अबोध बच्चा, मन का कच्चा।
कैसे सीख लेता है,  खाना, पीना, सोना।
लोग कहते है प्रकृति है,
मुझे लगता है तृप्ति है।
प्यास और भूख का, शरीर के सुख का।

एक अबोध बच्चा, मन का कच्चा।
कैसे सीख लेता है, रोना, धोना, हंसना।
लोग कहते है प्रकृति है,
मुझे लगता है वृत्ति है।
मन के व्याकुलता का, हृदय के अनुकूलता का।

एक अबोध बच्चा, मन का कच्चा।
कैसे सीख लेता है, उठना, बैठना, चलना।
लोग कहते है प्रकृति है,
मुझे लगता है प्रवृत्ति है।
मनुष्य समाज का, समाज के विकास का।

एक अबोध बच्चा, मन का कच्चा।
कैसे सीख लेता है, खेलना, कूदना, दौडना।
लोग कहते है प्रकृति है,
मुझे लगता है वृद्धि है।
दिल के उमंग का, शरीर के हर अंग का।

एक अबोध बच्चा, मन का कच्चा।
कैसे सीख लेता है, तोडना, फोडना, जोडना।
लोग कहते है प्रकृति है,
मुझे लगता है कृति  है।
व्याग्रता, द्वेष, क्रोध का, विकारों के विरोध का।

_______________________________


गोकुल कुमार पटेल


(इन रचनाओ पर आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए मार्गदर्शक बन सकती है, आप की प्रतिक्रिया के इंतजार में )



Wednesday, 22 March 2017

वो दोस्त मुझे अब बहुत याद आते है।

वो दोस्त मुझे अब बहुत याद आते है।
------------------------------------------


खेलने के लिए सुबह से ही जो बुलाया करते थे,
नाम को छोडकर जो कई उपनामों से चिढाया करते थे,
वो दोस्त मुझे अब बहुत याद आते है।

मिल कर एक साथ जो स्कूल जाया करते थे,
बैठ कर एक साथ, बाँटकर जो खाना खाया करते थे,
वो दोस्त मुझे अब बहुत याद आते है।

टेढी मेढी लकीरों से मेरा चित्र जो बनाया करते थे,
छिपाकर पेन,पेंसिल, पुस्तक जो मुझे सताया करते थे,
वो दोस्त मुझे अब बहुत याद आते है।

छिपकर किसी के भी पीछे जो मुझे डराया करते थे,
डरने पर रात में घर तक जो छोडने आया करते थे,
वो दोस्त मुझे अब बहुत याद आते है।

कंधों पर उठाकर जो पेडों पर चढा़या करते थे,
टहनियों पर बिठा कर जो झुला झुलाया करते थे,
वो दोस्त मुझे अब बहुत याद आते है।

हाथ पकड़ कर जो कीचड़ पर चलाया करते थे,
गुलाल बनाकर जो धुल उडाया करते थे,
वो दोस्त मुझे अब बहुत याद आते है।

छोटी-छोटी बातों से नाराज़ हो जाया करते थे,
और एक मुस्कान से जो मान भी जाया करते थे,
वो दोस्त मुझे अब बहुत याद आते है।

नाराज हो जाता था और मैं जब कभी,
मिलकर सब मुझे मनाया करते थे,
वो दोस्त मुझे अब बहुत याद आते है।

मेरी सही गलत आदतों को जो बताया करते थे,
कभी-कभी मेरी गलतियों को भी जो छिपाया करते थे,
वो दोस्त मुझे अब बहुत याद आते है।

मम्मी पापा के डाँट से जो मुझे बचाया करते थे,
दुख में गले लगा कर जो अपनापन जताया करते थे,
वो दोस्त मुझे अब बहुत याद आते है।

उल्टी-पुल्टी चुटकुले जो सुनाया करते थे,
अजीब-अजीब हरकतों से जो हँसाया करते थे,
वो दोस्त मुझे अब बहुत याद आते है।

चुपके से दबे पाँव जो पीछे से आ जाया करते थे,
जिनके याद में रह रहकर अब भी पीछे पलट जाया करता हूँ,
वो दोस्त मुझे अब बहुत याद आते है।

_______________________________

गोकुल कुमार पटेल


(इन रचनाओ पर आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए मार्गदर्शक बन सकती है, आप की प्रतिक्रिया के इंतजार में ।)

Tuesday, 14 March 2017

होली मनाओ सब मिल जुल

"होली मनाओ सब मिल जुल"
--------------------------------


होली के पावन पर्व पर मेरी भी लाईने है चंद,
लाईनों में आपके लिए, मेरी शुभकामनाएं है बंद।
बंद है पैकेटों में जैसे अबीर गुलाल और रंग,
रंग में मिला कर भेज रहा हूँ प्यार का सुगंध।
सुगंध जब फैलेगी हवा के साथ उड-उड बहार में,
बहार झूम उठेगा होली के इस रंग-बिरंगी त्यौहार में।
त्यौहार से खुशियां ही खुशियां आए आपके परिवार में।
परिवार ढेर सारा पकवान, गुजिया और मिठाई बनाए,
पकवान, गुजिया और मिठाई खाएं, खाकर जश्न मनाएं ।
जश्न मनाएं रंग लगाए, रंग लगाए नीला, पीला, लाल,
पीला, लाल हो जाएं औऱ साथ में रखे प्रकृति का ख्याल।
प्रकृति का हमेशा ख्याल रखो, न जाना भुल, कहे गोकुल,
खूब धूम मचाओ, रंग जमाओ, होली मनाओ सब मिल जुल।

🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

गोकुल कुमार पटेल

(इन रचनाओ पर आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए मार्गदर्शक बन सकती है, आप की प्रतिक्रिया के इंतजार में ।)

Friday, 3 March 2017

बढती दूरियों का राज

बढती दूरियों का राज
-------------------------

रोज़ याद न कर पाऊँ तो,
ये मत समझना कि,
मैं आप लोगों को भुल गया।

रोज़ कुछ लिख न पाऊँ तो,
ये मत समझना कि,
मैं आप लोगों को भुल गया।।

मुझे हर रिश्ते, हर नाते याद है
हर दोस्त और,
दोस्तों की हर लफ्ज, हर बातें याद है ।

बस कभी-कभी इस जिंदगी का,
अकेलापन मुझे खामोश कर जाती है।

बस कभी-कभी इस जिंदगी की,
परेशानियों से खामोश हो जाता हूँ ।

तब बेबसी मुझे तन्हा कर जाती है,
और खुद को सुलझाने की कोशिश में,
खुद ही उलझन बन जाता हूँ।

तब न चाह कर भी मजबूर हो जाता हूँ,
छोड़ कर सबसे अलग रहने को,
तब लाचारी में सबसे अपरिचित
औऱ अनजान बन जाता हूँ।

और तभी तो सोचता हूँ अक्सर,
क्या खोया हूँ, क्या पाया हूँ इस ज़माने में।

बस मेरी जिंदगी तो गुजर रही है सिर्फ,
दो वक़्त की रोटियां कमाने में।
--------------------------------------------


(इन रचनाओ पर आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए मार्गदर्शक बन सकती है, आप की प्रतिक्रिया के इंतजार में |)
गोकुल कुमार पटेल

Monday, 16 January 2017

मम्मी मुझे स्कूल जाना है

"मम्मी मुझे स्कूल जाना है"












मम्मी सुबह जल्दी जगा देना,
मुझे स्कूल जाना है।
मम्मी सुबह जल्दी नहला देना,
मुझे स्कूल जाना है।
मम्मी कपड़ा पहना देना,
मुझे स्कूल जाना है।
मम्मी रोटी जल्दी बना देना,
मुझे स्कूल जाना है।
मम्मी पुस्तक पेन दिला देना,
मुझे स्कूल जाना है।
मम्मी अक्षर दिया टीचर ने,
मम्मी शब्द लिखना सीखा देना,
मुझे स्कूल जाना है।
मम्मी ज्ञान बँट रहा स्कूल में
मम्मी शिक्षा का दीप जला देना,
मुझे स्कूल जाना है।
मम्मी होमवर्क मिलता है स्कूल से,
मम्मी होमवर्क हल करा देना,
मुझे स्कूल जाना है।
पाठ पुरा तब अपना करूंगा,
पुरा तब आपका हर सपना करुंगा।
मम्मी सुबह जल्दी जगा देना,
मुझे स्कूल जाना है।
____________________________________

 (इन रचनाओ पर आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए मार्गदर्शक बन सकती है, आप की प्रतिक्रिया के इंतजार में |)

गोकुल कुमार पटेल