Friday, 15 June 2018

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Sunday, 1 April 2018

एक बार फिर आ जाओ मेरे राम


एक बार फिर आ जाओ मेरे राम
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एक बार फिर आ जाओ मेरे राम,
बना दो हमारे सारे बिगड़े काम।

मतभेदों का यहाँ विस्तार हो रहा,
हिंसा का यहाँ  व्यापार हो रहा।
पाप पौ पसारे यहाँ निर्विराम,
एक बार फिर आ जाओ मेरे राम,
बना दो हमारे सारे बिगड़े काम।

भरत सा अब यहाँ कोई भाई नहीं,
कौशल्या सा अब यहाँ कोई माई नहीं।
करने लगे है सब मंथरा सा काम,
एक बार फिर आ जाओ मेरे राम,
बना दो हमारे सारे बिगड़े काम।

दशरथ सा अब यहाँ कोई पिता नहीं,
पत्नी भी अब यहाँ कोई सीता नहीं।
कैकेयी से वचन का हो रहा दुष्परिणाम,
एक बार फिर आ जाओ मेरे राम,
बना दो हमारे सारे बिगड़े काम।

गुरु वाल्मीकि अब खो गए है,
अहिल्या सा पत्थर सब हो गए है।
कब आयेंगे फरसाधारी परशुराम,
एक बार फिर आ जाओ मेरे राम,
बना दो हमारे सारे बिगड़े काम।

हर जगह ताडका वन यहाँ,
सुर्पणखा सा सारा मन यहाँ।
खर दुषण सा लेने लगे है प्राण,
एक बार फिर आ जाओ मेरे राम,
बना दो हमारे सारे बिगड़े काम।

सब जगह है स्वर्ण मृगमारिच सा छल,
सब जगह बढ़़ गया है बहरूपियो का बल।
हो रहा सब जगह नारी के हरण का काम,
एक बार फिर आ जाओ मेरे राम,
बना दो हमारे सारे बिगड़े काम।

जटायु सा अब न दास यहाँ,
शबरी सा न अब आस यहाँ।
न जाने कहाँ चले गए हनुमान,
एक बार फिर आ जाओ मेरे राम,
बना दो हमारे सारे बिगड़े काम।

कोई केवट सा न व्यापारी यहाँ,
बने है बाली सा सब दुराचारी यहाँ।
कोई पत्थर पर भी लिखता नही राम,
एक बार फिर आ जाओ मेरे राम,
बना दो हमारे सारे बिगड़े काम।

पल पल सुरसा मुहँ खोल रही,
मंदोदरी जैसी हर पल बोल रही।
हठ में चला न जाये निर्दोषों के प्राण,
एक बार फिर आ जाओ मेरे राम,
बना दो हमारे सारे बिगड़े काम।

रावण सा छल चल रहा यहाँ,
बैर हर मन में पल रहा यहाँ।
छिड न जाये देव दानव सा संग्राम,
एक बार फिर आ जाओ मेरे राम,
बना दो हमारे सारे बिगड़े काम।

सत्य पर समय हो गया है बलवान,
न रही लक्ष्मण जैसी भक्ति निष्काम।
विनती करे गोकुल सुबहों शाम,
एक बार फिर आ जाओ मेरे राम,
बना दो हमारे सारे बिगड़े काम।
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गोकुल कुमार पटेल

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Tuesday, 27 February 2018

पर ऐसा नहीं कि....

पर ऐसा नहीं कि....
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पत्थर का पुजारी हूँ, पुजता हूँ पत्थर को,
इस पर लोहार सा प्रहार कैसे करूँ,
पर ऐसा नही है की चोट के डर से,
मैंने मुर्ति गढना छोड़ दिया है।

अक्षर अक्षर मिलकर शब्द बनते हैं,
शब्दों से रिश्तों की परिभाषा बयां होती है।
मैं नहीं जानता नहीं पहचानता बहुत से अक्षरों को,
पर ऐसा नही है की कुछ अक्षरों के अज्ञान से,
मैंने पढना छोड़ दिया हैं।

ये जानते हुए कि दूरियों से रिश्ते टूट जाते है
दूरियां बना ली है सबसे दूर रहकर।
पर ऐसा नहीं हैं कि अकेले-अकेले रहते हुए,
मैने अपनों से मिलना छोड दिया है।

चलते-चलते पाँव घायल है काँटों से जरूर
थककर ठहर गया हूँ थोड़ा विश्राम के लिए,
पर ऐसा नही है कि रूककर,
मैंने आगे बढना छोड़ दिया है।

मंजिल मेरी दूर तलक ऊँचाई पर है,
डरता हूँ ऊँचे लोगों की ऊँचाई से
पर ऐसा नही है की ऊँचाई के डर से,
मैंने ऊँचाई पर चढना छोड़ दिया है।

घटते-घटते शुन्य हो जाऊँ या बढते-बढते,
आखिरकार सबकुछ भाग होकर शुन्य हो जाऐगा।
पर ऐसा नहीं है कि शुन्य होने के डर से,
मैंने अंकों का गिनती करना छोड़ दिया है।

मैं भी मिट्टी तु भी मिट्टी, सब कुछ बना मिट्टी से,
और एक दिन सब कुछ मिट्टी हो जायेगा।
पर ऐसा नहीं है कि मिट्टी होने के डर से,
मैंने मिट्टी से नव निर्माण करना छोड़ दिया है।
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गोकुल कुमार पटेल

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Thursday, 4 January 2018

नया साल मुझे भी मनाना होगा


नया साल मुझे भी मनाना होगा
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माफ कर देना मुझे हे भारती।
निर्लज्जता का मुखौटा मुझे भी चढाना होगा।
छोड़कर निज संस्कारों को।
पाश्चात्य सभ्यता मुझे भी अपनाना होगा।
अंजान बन यथार्थ से।
झूठ फरेब का आडम्बर मुझे भी रचाना होगा।
भुलकर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा।
एक जनवरी को नया साल मुझे भी मनाना होगा।

सुसंस्कृति संग आगे जो बढना चाहूँ।
आगे बढ न पाऊँगा।
कुसंस्कृति की हाथ पकड़।
कदम से कदम मुझे भी बढाना होगा।
दिखावे की बलि बेदी पर
तीज त्यौहारों की बलि मुझे भी चढाना होगा।
माफ कर देना मुझे हे भारती।
निर्लज्जता का मुखौटा मुझे भी चढाना होगा।
भुलकर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा।
एक जनवरी को नया साल मुझे भी मनाना होगा।

मृगमरीचिका की तरह दौड़ रहे।
किसी के रोके कब रूके है।
बदलने की चाह में।
धोती कुर्ता कब के छोड़ चुके है।
रिश्तों का लिहाज नहीं।
बुजुर्गों का सम्मान नहीं।
धर्म अधर्म का फेर नहीं।
राम कृष्ण का नाम नहीं।
आरती भजन को दरकिनार कर।
मन की पीडा को मुझे भी मन में दबाना होगा।
माफ कर देना मुझे हे भारती।
निर्लज्जता का मुखौटा मुझे भी चढाना होगा।
भुलकर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा।
एक जनवरी को नया साल मुझे भी मनाना होगा।

सबको पता है सब जानते है।
चुप है वे सबकुछ जानकर।
सब ही बधाई भेज रहे।
अपना मुझको मानकर।
कैसे मैं दुत्कार दूँ सगे संबंधी, दोस्त यार को।
कैसे मैं ठुकरा दू उनके स्नेह, प्यार, दूलार को।
विवशता में ही सही अपनापन मुझे भी जताना होगा।
माफ कर देना मुझे हे भारती।
निर्लज्जता का मुखौटा मुझे भी चढाना होगा।
भुलकर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा।
एक जनवरी को नया साल मुझे भी मनाना होगा।

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गोकुल कुमार पटेल

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Friday, 29 December 2017

तब तुम्हें एहसास होगा मोहब्बत किसे कहते है

तब तुम्हें एहसास होगा मोहब्बत किसे कहते है
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जब लडकपन छोड़ तुम हो जाओगी सयानी,
तब तुम्हें एहसास होगा मोहब्बत किसे कहते है।
जब किसी के प्यार में तुम हो जाओगी दिवानी।
तब तुम्हें एहसास होगा मोहब्बत किसे कहते है।
जब किसी के याद में तडपेगी तुम्हारी जवानी,
तब तुम्हें एहसास होगा मोहब्बत किसे कहते है।
जब चला जाऊँगा और रह जायेगा मेरी निशानी,
तब तुम्हें एहसास होगा मोहब्बत किसे कहते है।
जब मेरे प्यार की हकीकत बन जायेगी कहानी।
तब तुम्हें एहसास होगा मोहब्बत किसे कहते है।
जब सुनोगे तुम मेरे दिल ये बयां औरों के जुबानी,
तब तुम्हें एहसास होगा मोहब्बत किसे कहते है।
जब कभी कोई करेगा मेरे जैसा शरारत, शैतानी,
तब तुम्हें एहसास होगा मोहब्बत किसे कहते है।
जब कोई गीत सुनायेगा मैं तेरा राजा तु मेरी रानी।
तब तुम्हें एहसास होगा मोहब्बत किसे कहते है।
जब सर्द हवाओं से हो जायेगा मौसम सुहानी,
तब तुम्हें एहसास होगा मोहब्बत किसे कहते है।
जब साथ कोई न हो और बढ जायेगी परेशानी।
तब तुम्हें एहसास होगा मोहब्बत किसे कहते है।
जब पडेगी हर बातों को अपने ही मन में दबानी,
तब तुम्हें एहसास होगा मोहब्बत किसे कहते है।
जब नीरस सा लगने लगेगा अपनी जिंदागानी।
तब तुम्हें एहसास होगा मोहब्बत किसे कहते है।
जब पड जायेगी तस्वीरों को तस्वीरों में छिपानी।
तब तुम्हें एहसास होगा मोहब्बत किसे कहते है।
जब खतों को न चाह कर पड जायेगी जलानी।
तब तुम्हें एहसास होगा मोहब्बत किसे कहते है।
जब प्यार के प्यार को देखकर होगी तुम्हें हैरानी,
तब तुम्हें एहसास होगा मोहब्बत किसे कहते है।
जब दिल का जख्म ताजा हो और दर्द हो पुरानी,
तब तुम्हें एहसास होगा मोहब्बत किसे कहते है।
जब बहेगी तेरे गालों पे मेरे आँखों का पानी,
तब तुम्हें एहसास होगा मोहब्बत किसे कहते है।

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गोकुल कुमार पटेल


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Sunday, 3 December 2017

मुझे भी भगवा लहराने दो

"मुझे भी भगवा लहराने दो"
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कर्तव्य पथ पर साथ चलूंगा, मुझे भी साथ आने दो।
पल भर ठहर जाओ, मुझे भी केसरिया सजाने दो।
देशप्रेम की भावना मन में मेरे उत्साह भर रहा।
कतरा कतरा खून रगो का मुझको हर्षित कर रहा।
सारा अंबर गुंजित होगा भारतमाता के जय जयकारो से।
जय हिन्द वन्दे मातरम् का नारा मुझे भी लगाने दो।
मैं भी हूँ हिन्दू की संतान, मुझे भी भगवा लहराने दो।

सारा जहाँ जहाँ हिन्दूत्व का झंडा लहरा रहा।
हिन्दू हिन्दू पर ही यहाँ डंडा बरसा रहा।
कुछ तो नादान है कुछ नादान बने बैठे है।
कुछ तो मुस्लिमों का फरमान बने बैठे है।
कुंठित मन मुक्त होगा शंकाओं के घेरो से।
धधक उठेगी ज्वाला कोयले के ढेरों से।
झूठ कपट का बादल छठ जाने दो।
राम कृष्ण का भजन मुझे भी सुनाने दो।
जय हिन्द वन्दे मातरम् का नारा मुझे भी लगाने दो।
मैं भी हूँ हिन्दू की संतान, मुझे भी भगवा लहराने दो।

शैतान झूठ फरेब का हर सामान लिए बैठा है।
बहरूपिया गली गली में भगवान बना बैठा है।
पाखंडी आडम्बरो से समाज को दूषित कर रहा।
धूर्तता से धुर्त अबोध मन में मीठा जहर भर रहा।
भेद नहीं कर पा रहा मन धार्मिक मतभेदों में।
ज्ञान सोई हुई है अपने ही पुराणों और वेदों में।
मानवता का पाठ अब सबको पढाना होगा।
चीर निंद्रा से सत्य को अब जगाना होगा।
ढोल नगाडा और मृदंग मुझे भी बजाने दो।
जय हिन्द वन्दे मातरम् का नारा मुझे भी लगाने दो।
मैं भी हूँ हिन्दू की संतान, मुझे भी भगवा लहराने दो।

रखो विश्वास, छोडो न आस।
जब तक रहेगी तन में साँस।
रघुकुल की गरिमा कलंकित न हो पायेगी।
कुरूवंश की घटना दूबारा घटित न हो पायेगी।
विक्रमादित्य का आह्वान करूंगा।
अखंड भारत का सपना साकार करूंगा।
कृष्ण भक्ति में रमकर,
गीता के उपदेशों का विस्तार करूंगा।
पांचजन्य पर एक बार फिर से मुझे भी फूंक लगाने दो।
जय हिन्द वन्दे मातरम् का नारा मुझे भी लगाने दो।
मैं भी हूँ हिन्दू की संतान, मुझे भी भगवा लहराने दो।

बलिदानी रक्त मुझे भी पुकारती है।
अंबर का वक्त मुझे भी निहारती है।
हौसले से मेरा भी रक्त उफन रहा,
रोम-रोम मेरा भी, मुझको धिक्कारती है।
अब तो मैंने ठान लिया है,
लक्ष्य अपना जान लिया है।
अब तो दीपक राग गाऊँगा,
या खुद ही दीप बन जाऊँगा।
अखंड ज्योत के इस प्रकाश से विश्व को जगमगाने दो।
मैं भी हूँ हिन्दू की संतान, मुझे भी भगवा लहराने दो।

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गोकुल कुमार पटेल


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