Friday, 20 July 2018

मेरी कुछ कविताएँ

"मेरी कुछ कविताएँ"
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अकसर कागज पर चमकती है,
और निस्तेज होकर गुम हो जाती है,
क्षणभंगुर सोच की तरह, मेरी कुछ कविताएँ।

किसी के मन को स्पर्श कर झकझोरती है,
और अश्क बन गिर जाती है, उड जाती है,
क्षणिक ओस की तरह, मेरी कुछ कविताएँ।

किसी को समझा देता है अर्थ, शब्दों का,
और कभी अर्थहीन हो जाता है, रंगहीन हो जाता है,
क्षणिक इंद्रधनुष की रंगों की तरह, मेरी कुछ कविताएँ।

किसी को पंसद आता है किसी को उदास कर जाता है,
और किसी को बोलने पर मजबूर कर, चुप हो जाता है,
क्षणिक घंटों की टंकार की तरह, मेरी कुछ कविताएँ।

किसी का सपना बन जाती है तो किसी को अपना बनाती है,
और चिपकी रहती है, कभी कंधों पर तो कभी कदमों पर,
क्षणिक ठोकर खाकर उडती धुल की तरह,मेरी कुछ कविताएँ।

मेरी कल्पनाओं में खेलती है, कुदती है, बेटियों की तरह,
और परायी होकर सारे रिश्ते तोड़ जाती है , छोड़ जाती है,
क्षणिक परिजात की फुल की तरह,मेरी कुछ कविताएँ।

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गोकुल कुमार पटेल

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Sunday, 1 April 2018

एक बार फिर आ जाओ मेरे राम


एक बार फिर आ जाओ मेरे राम
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एक बार फिर आ जाओ मेरे राम,
बना दो हमारे सारे बिगड़े काम।

मतभेदों का यहाँ विस्तार हो रहा,
हिंसा का यहाँ  व्यापार हो रहा।
पाप पौ पसारे यहाँ निर्विराम,
एक बार फिर आ जाओ मेरे राम,
बना दो हमारे सारे बिगड़े काम।

भरत सा अब यहाँ कोई भाई नहीं,
कौशल्या सा अब यहाँ कोई माई नहीं।
करने लगे है सब मंथरा सा काम,
एक बार फिर आ जाओ मेरे राम,
बना दो हमारे सारे बिगड़े काम।

दशरथ सा अब यहाँ कोई पिता नहीं,
पत्नी भी अब यहाँ कोई सीता नहीं।
कैकेयी से वचन का हो रहा दुष्परिणाम,
एक बार फिर आ जाओ मेरे राम,
बना दो हमारे सारे बिगड़े काम।

गुरु वाल्मीकि अब खो गए है,
अहिल्या सा पत्थर सब हो गए है।
कब आयेंगे फरसाधारी परशुराम,
एक बार फिर आ जाओ मेरे राम,
बना दो हमारे सारे बिगड़े काम।

हर जगह ताडका वन यहाँ,
सुर्पणखा सा सारा मन यहाँ।
खर दुषण सा लेने लगे है प्राण,
एक बार फिर आ जाओ मेरे राम,
बना दो हमारे सारे बिगड़े काम।

सब जगह है स्वर्ण मृगमारिच सा छल,
सब जगह बढ़़ गया है बहरूपियो का बल।
हो रहा सब जगह नारी के हरण का काम,
एक बार फिर आ जाओ मेरे राम,
बना दो हमारे सारे बिगड़े काम।

जटायु सा अब न दास यहाँ,
शबरी सा न अब आस यहाँ।
न जाने कहाँ चले गए हनुमान,
एक बार फिर आ जाओ मेरे राम,
बना दो हमारे सारे बिगड़े काम।

कोई केवट सा न व्यापारी यहाँ,
बने है बाली सा सब दुराचारी यहाँ।
कोई पत्थर पर भी लिखता नही राम,
एक बार फिर आ जाओ मेरे राम,
बना दो हमारे सारे बिगड़े काम।

पल पल सुरसा मुहँ खोल रही,
मंदोदरी जैसी हर पल बोल रही।
हठ में चला न जाये निर्दोषों के प्राण,
एक बार फिर आ जाओ मेरे राम,
बना दो हमारे सारे बिगड़े काम।

रावण सा छल चल रहा यहाँ,
बैर हर मन में पल रहा यहाँ।
छिड न जाये देव दानव सा संग्राम,
एक बार फिर आ जाओ मेरे राम,
बना दो हमारे सारे बिगड़े काम।

सत्य पर समय हो गया है बलवान,
न रही लक्ष्मण जैसी भक्ति निष्काम।
विनती करे गोकुल सुबहों शाम,
एक बार फिर आ जाओ मेरे राम,
बना दो हमारे सारे बिगड़े काम।
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गोकुल कुमार पटेल

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Tuesday, 27 February 2018

पर ऐसा नहीं कि....

पर ऐसा नहीं कि....
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पत्थर का पुजारी हूँ, पुजता हूँ पत्थर को,
इस पर लोहार सा प्रहार कैसे करूँ,
पर ऐसा नही है की चोट के डर से,
मैंने मुर्ति गढना छोड़ दिया है।

अक्षर अक्षर मिलकर शब्द बनते हैं,
शब्दों से रिश्तों की परिभाषा बयां होती है।
मैं नहीं जानता नहीं पहचानता बहुत से अक्षरों को,
पर ऐसा नही है की कुछ अक्षरों के अज्ञान से,
मैंने पढना छोड़ दिया हैं।

ये जानते हुए कि दूरियों से रिश्ते टूट जाते है
दूरियां बना ली है सबसे दूर रहकर।
पर ऐसा नहीं हैं कि अकेले-अकेले रहते हुए,
मैने अपनों से मिलना छोड दिया है।

चलते-चलते पाँव घायल है काँटों से जरूर
थककर ठहर गया हूँ थोड़ा विश्राम के लिए,
पर ऐसा नही है कि रूककर,
मैंने आगे बढना छोड़ दिया है।

मंजिल मेरी दूर तलक ऊँचाई पर है,
डरता हूँ ऊँचे लोगों की ऊँचाई से
पर ऐसा नही है की ऊँचाई के डर से,
मैंने ऊँचाई पर चढना छोड़ दिया है।

घटते-घटते शुन्य हो जाऊँ या बढते-बढते,
आखिरकार सबकुछ भाग होकर शुन्य हो जाऐगा।
पर ऐसा नहीं है कि शुन्य होने के डर से,
मैंने अंकों का गिनती करना छोड़ दिया है।

मैं भी मिट्टी तु भी मिट्टी, सब कुछ बना मिट्टी से,
और एक दिन सब कुछ मिट्टी हो जायेगा।
पर ऐसा नहीं है कि मिट्टी होने के डर से,
मैंने मिट्टी से नव निर्माण करना छोड़ दिया है।
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गोकुल कुमार पटेल

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Thursday, 4 January 2018

नया साल मुझे भी मनाना होगा


नया साल मुझे भी मनाना होगा
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माफ कर देना मुझे हे भारती।
निर्लज्जता का मुखौटा मुझे भी चढाना होगा।
छोड़कर निज संस्कारों को।
पाश्चात्य सभ्यता मुझे भी अपनाना होगा।
अंजान बन यथार्थ से।
झूठ फरेब का आडम्बर मुझे भी रचाना होगा।
भुलकर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा।
एक जनवरी को नया साल मुझे भी मनाना होगा।

सुसंस्कृति संग आगे जो बढना चाहूँ।
आगे बढ न पाऊँगा।
कुसंस्कृति की हाथ पकड़।
कदम से कदम मुझे भी बढाना होगा।
दिखावे की बलि बेदी पर
तीज त्यौहारों की बलि मुझे भी चढाना होगा।
माफ कर देना मुझे हे भारती।
निर्लज्जता का मुखौटा मुझे भी चढाना होगा।
भुलकर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा।
एक जनवरी को नया साल मुझे भी मनाना होगा।

मृगमरीचिका की तरह दौड़ रहे।
किसी के रोके कब रूके है।
बदलने की चाह में।
धोती कुर्ता कब के छोड़ चुके है।
रिश्तों का लिहाज नहीं।
बुजुर्गों का सम्मान नहीं।
धर्म अधर्म का फेर नहीं।
राम कृष्ण का नाम नहीं।
आरती भजन को दरकिनार कर।
मन की पीडा को मुझे भी मन में दबाना होगा।
माफ कर देना मुझे हे भारती।
निर्लज्जता का मुखौटा मुझे भी चढाना होगा।
भुलकर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा।
एक जनवरी को नया साल मुझे भी मनाना होगा।

सबको पता है सब जानते है।
चुप है वे सबकुछ जानकर।
सब ही बधाई भेज रहे।
अपना मुझको मानकर।
कैसे मैं दुत्कार दूँ सगे संबंधी, दोस्त यार को।
कैसे मैं ठुकरा दू उनके स्नेह, प्यार, दूलार को।
विवशता में ही सही अपनापन मुझे भी जताना होगा।
माफ कर देना मुझे हे भारती।
निर्लज्जता का मुखौटा मुझे भी चढाना होगा।
भुलकर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा।
एक जनवरी को नया साल मुझे भी मनाना होगा।

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गोकुल कुमार पटेल

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