Saturday, 3 November 2012

भाग्य


भाग्य

भाग्य को किस्मत, तक़दीर, मुक्कदर, नसीब आदि नामों से जानते है और अक्सर लोगों को कहते भी सुना है की उसके भाग्य में लिखा था इसलिए उसे मिला?, तुम्हारें भाग्य में नहीं लिखा है तो तुम्हें नहीं मिलेगा?, तुम्हारें भाग्य में जो लिखा है वही होगा?, तुम्हारें भाग्य में जितना लिखा होगा वही तुम्हें मिलेगा?, भाग्य से अधिक तुम्हें कुछ नहीं मिल सकता?, भाग्य से कोई लड़ नहीं सकता?,  भाग्य से लड़ना हमारें बस की बात नहीं है?, भाग्य कोई बदल नहीं सकता है ? इस प्रकार भाग्य के बारे में तरह-तरह के लोगों से तरह-तरह की बातें सुनने को मिलती है l

पर कभी आपने सोचा है की - 

आख़िरकार ये भाग्य है क्या ? जिससे अधिक हमें कुछ क्यों नहीं मिल सकता ? हमें जो मिलना है उसका निर्धारण पहले से कैसे कर लेता है? यह कैसे किसी के साथ जुड़ जाता है? यह कैसे बनता है ? क्या इसे बदला जा सकता है? हम कैसे इसे बदल सकते है? या फिर यह बदला ही नहीं जा सकता है ? क्यों यह बदला नहीं जा सकता है? इस तरह के न जाने कितने सवाल हमारें दिमाग में उठते है और हम भाग्य को जानने के लिए, भाग्य को बदलने के लिए मंदिरों में, दरगाहों में घुमते रहते है कभी-कभी पाखंडी बाबाओं के चक्कर में फंस कर अपना सब कुछ भी गवां बैठते है l और भाग्य की बिडम्बना तो देखो ईश्वर तो ईश्वर, अगर सदगुरुदेव सामने भी आ जाते है तो भी हम उन्हें पहचान नहीं पाते है और बिना किसी समाधान के निराश, निरुत्तर मौन होकर अपने भाग्य को कोसते रहते है l 

            ज्योतिष शास्त्र की माने तो भाग्य पूर्व जन्म का फल है, पूर्व जन्म में हमने जैसे-जैसे कर्म किये है उसी के अनुसार हमें फल मिलता है l इसको हम इस तरह से समझ सकते है मनुष्य का कर्म अर्थात मनुष्य का वर्तमानकाल जब व्यतीत होता है तो वह भुतकाल बन जाता है और उसी भूतकाल से भविष्यकाल का निर्धारण होता है l पूरी सृष्टि जैसे एक चक्र पूरा करता है उसी तरह मनुष्य का भाग्य चक्र भी वर्तमान काल से भुतकाल, भुतकाल से भविष्यकाल और भविष्यकाल से वर्तमानकाल तक घूमता रहता है l जब तक मनुष्य मोक्ष को प्राप्त नहीं कर लेता है, तब तक यह भाग्य चक्र निरंतर चलता रहता है, चलता रहता है l

इसका मतलब तो यह हुआ की कर्म प्रधान होता है l और कर्म से भाग्य बनता है, तब मन में प्रश्न यह उठता है की फिर एक बच्चा कैसे अमीर घर में जन्म लेता है तो एक बच्चा गरीब घर में जन्म लेता है, कोई अपंग होता है तो कोई जन्म लेते ही काल का ग्रास भी हो जाता है l और तो और बच्चा कैसे गर्भ में ही दम तोड़ देता है उन्होंने तो कोई कर्म किया ही नहीं होता है, तब किस आंकलन से निर्बोध बालक का भाग्य तय होता है फिर कैसे हम माने की कर्म से भाग्य का निर्माण होता है l

ये सच है की भाग्य के निर्माण में कर्म की भूमिका अहम् होती है पर केवल कर्म से ही भाग्य का निर्माण नहीं होता है वरन किसी भी भाग्य के निर्माण में उसके उसके माता-पिता और पूर्वजों के कर्मों का भार जुड़ने के साथ-साथ ही जनम लेते समय जिस वातावरण अर्थात उस समय की ग्रहों और नक्षत्रों की चाल से जिस परिस्थिति तंत्र का निर्माण होता है वह भी भाग्य के निर्माण में बहुत महत्वपूर्ण होता है l शाब्दिक अर्थों में हम अगर भाग्य को परिभाषित करें तो हमारे पूर्वजन्म के कर्मों और हमारे पूर्वजों के कर्मों और उस समय की ग्रहों एवं नक्षत्रों की चाल से जन्म लेते समय जिस वातावरण का निर्माण होता है उन परिस्थितिओं की गणनाएं ही हमारा भाग्य कहलाती है और जिसे हम अपने सदकर्मो और सदगुरुदेवजी के आशीर्वाद के द्वारा परिवर्तन कर सकते है l

सभी मनुष्यों के जीवन में भाग्य को सुधारने का, सवांरने का समय आता है परन्तु उसे वह माहौल नहीं मिल पाता और जब वह माहौल मिलता है तो अपने कर्म से भटक जाता है l उन्हीं सद्कर्म करने की इच्छाओं और माहौल का निर्माण तभी हो पाता है जब हम सदगुरुदेवजी के चरणों में अपने अहं को त्याग कर समर्पित हो जाते है, नतमस्तक हो जाते है और उनके आशीर्वाद और कृपा का पात्र बनते है अर्थात अपने भाग्य को सवांरने के लिए जीवन में सदगुरुदेवजी का आशीर्वाद होना परम आवश्यक है l


(इन रचनाओ पर आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए मार्गदर्शक बन सकती है, आप की प्रतिक्रिया के इंतजार में l)
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