Monday, 7 May 2012

सपना है या अनुभूति - 1


सपना है या अनुभूति - 1

वह पल रह रह कर मेरे स्मृति को विस्मित कर रहा था उस रात अचानक मेरी आँख खुल गई थी, मेरा मन विचलित हुआ जा रहा था, मैंने उठ कर दरवाजा खोला और नजरें घुमाकर कर जायजा लिया तो देखा की सब कुछ मौन है l  झींगुर  की भी आवाज  कानों  तक  नहीं पहुँच पा रही थी पता नहीं क्यों आज सब चुप से दुबके हुए थे और चारों ओर सन्नाटा ही सन्नाटा छाया हुआ था l

मैं जैसे ही दरवाजा बंद करके पलटा तब मुझे पहली बार उस गहरी अन्धकार का साक्षात्कार हुआ, प्रकृति की वह चकाचौंध जो मैंने दिन के उजाले में देखी थी विलुप्त हो चुकी थी, ऐसा लग रहा था मानों पूरा आकाश मंडल ही राहू का ग्रास हो गया हो, वह चिर अन्धकार मेरे मन को झकझोर कर रख दिया, मन में भय की एक लकीर खिचतीं सी चली गई, पर पता नहीं क्यों उस भय से मैं विचलित नहीं हुआ, कोई शक्ति थी कोई आवाज थी जो मुझे उस अन्धकार की तरफ खींच रही थी और मैं चाह कर भी अपने आप को रोक नहीं पा रहा था आख़िरकार माँ और सदगुरुदेवजी को मन ही मन याद कर मैं उस काले समंदर में कदम बढ़ा ही दिया जहाँ से न तो मंजिल ही दिख रही थी और न ही रास्तों का कुछ पता लग रहा था, कुछ देर मैं यु ही दिशाहीन भटकता रहा, चलता रहा पर अचानक पता नहीं कैसे मेरे पैरों में गजब की स्फूर्ति आ गई, पैर जमीं पर टिक नहीं रहे थे मेरे रफ़्तार में तेजी आ गई थी मैं पूरी वेग से दौड़ता चला जा रहा था, दौड़ता चला जा रहा था यु ही कब तक दौड़ता रहा उसका मुझे कोई होश नहीं थाl

अब मेरी धड़कन जोर जोर से धडक रहा था पूरा शरीर थकान से निढाल हुआ जा रहा था, सारा अंग मन से विश्राम की अनुमति मांग रहा था, पर मन पर न जाने क्या धुन सवार था की उनकी बातों को स्वीकार करने को तैयार ही नहीं था अंतत: सारा शरीर निढाल होकर ढीला पड़ गया और एक पेड़ के समीप गिर पड़ा, कुछ देर बाद आँखों ने हरकत की नजर घुमा कर देखा तो एक प्रकाश पुंज अँधेरे को चीरते हुए मेरे आँखों से टकरा रही थी मैं सहसा उठा और उस प्रकाश की दिशा में दौड़ने लगा ज्यों-ज्यों मैं आगे बढ रहा था वह प्रकाश बढ़ता जा रहा था धीरे-धीरे उस प्रकाश ने मुझे अपने में समाहित कर लिया, अब मैं एक मंदिर के सामने था अखंड सूर्य से प्रकाशित स्वच्छ सफ़ेद मंदिर मुझे आलौकिक आनंद की अनुभूति करा रहा था, मेरी जिज्ञासा बढ रही थी और उस जिज्ञासा ने मुझे अन्दर प्रवेश करने से रोक नहीं पाया l सीढियाँ चढ़ते-चढ़ते मैं दरवाजे के पास पहुंचा, दरवाजा बंद था मैंने आँखें बंद कर के एक बार फिर से माँ और गुरूजी स्मरण किया l और ऊपर लटकती हुई घंटी को बजा कर दरवाजा खोलने के लिए जैसे ही कदम बढ़ाया सहसा मेरे मुख से एक चीख निकल पड़ी मेरा पैर किसी वस्तु से टकराया था जिसकी मैंने कल्पना ही नहीं की थी मैंने नीचे नजर झुकाई तो देखा की एक नरमुंड पड़ा है मेरे मन में भय की पुनरावृति हो गई, भय से बचाव के लिए मैंने इधर उधर नजरें दौड़ाई तो देखा सैकड़ों नरमुंड ऐसे ही यत्र-तत्र बिखरे पड़े है उस नज़ारे को देख कर मैं इतना भयभीत हुआ की भय ने मुझे झकझोर कर रख दिया l मेरे मुंह से चींख निकल गई और मैं आँखें खोलते हुए उठ बैठा l

देखा - मैं बिस्तर में बैठा हुआ हूँ, तब मुझे एहसास हुआ की यह मेरी निंद्रा अवस्था की सोच थी, मात्र एक सपना था, पर कहते है की सपने अक्सर किसी घटना से जुड़े होते है पता नहीं यह कहाँ तक सच है?  मैं नहीं जानता? पर कभी-कभी यह प्रश्न आज भी मेरे जहन में उठता है की? वह कौन सी शक्ति थी जो मुझे खींच रही थी?  कही वो सदगुरुदेव की आवाज तो नहीं थी जो मुझे खींच रही थी? वह शक्ति मुझे क्यों खीच रही थी? आखिर वह शक्ति मुझे क्या याद दिलाना चाह रही थी? क्या यह मेरे पिछले जन्म की कोई घटना थी?  पिछले जन्म में मैं कौन था? मैं वहां क्यों और कैसे पंहुचा था?  या यह आने वाली कोई घटना से मुझे अवगत करा रही थी? 

इन्ही सारे सवालों की जवाब ढुंढने की कोशिश में.............


(इन रचनाओ पर आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए मार्गदर्शक बन सकती है, आप की प्रतिक्रिया के इंतजार में l)

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