Tuesday, 8 May 2012

बिजली की आंखमिचौली


बिजली की आंखमिचौली 

शक्ति का रूप वह,
बिन आग के भी है वो जली,
हर तरफ फैला है जो,
नाम उसका है बिजली l
रात में जब बंद हो जाती है रौशनी,
बढ़ जाती है सबकी परेशानी l
बंद हो जाती है जब टी.वी. ,
गुस्से होते है बच्चे बीबी l
कड़ककर कहती है नहीं चल रहा है पम्प हीटर,
खाना नहीं मिलेगा बिछा लो बिस्तर l
मैं बहुत धीमे से कहता हूँ,
नहीं चल रहा है जब हीटर और पम्प l
हैण्ड पम्प से मटका भर,
लकड़ी से खाना बनाने का अपना लो ढंग l
चीखकर वो कहती है,
क्या कहा?
एक भी दिन हमने ठीक से बिजली पाई है l
नहीं जानते?
हर महीने कितने रुपये बिजली बिल पटाई है l
उसके गुस्से के डर से चुपचाप रहता हूँ l
वो बोलती है और मैं कुछ नहीं कहता हूँ l
उसका पक्ष लेकर कहूँ तो, 
मुझे जोरू का गुलाम कहेगें l
पर जरा सोचो?
बिजली के बिना हम कैसे रहेंगे l
कब तक, आखिर कब तक हम अन्याय सहेंगे l
तब तक अन्याय होगा, 
जब तक हम कुछ नहीं कहेंगे l


(इन रचनाओ पर आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए मार्गदर्शक बन सकती है, आप की प्रतिक्रिया के इंतजार में l)

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