Wednesday, 22 May 2013

“एक राहनुमा की मुझे तलाश है”

“एक राहनुमा की मुझे तलाश है”

किसे कहूँ मैं अपने मन की बात l
कैसे कहूँ मैं अपने मन की बात l l
कोई समझता नहीं,
कोई समझने की कोशिश करता नहीं l
सरपट भाग रहे है अंधेरों में,
राहों से भटक कर,
एक पल के लिए कोई ठहरता नहीं l l
कभी तो थकेंगें, कभी तो रुकेंगे,
ये मैंने जाना है l
उनके पीछे पीछे दौड़ रहा हूँ,
मैंने हार नहीं माना है l l
कब तक दौड़ता रहूँगा,
उनके पीछे,
अनजानी ये आस है l
तब भी समय न उनके पास था, 
न अब ही समय उनके पास है l l
अब तो भागते भागते,
खुद ही भटक गया हूँ,
आँखें है पथराई, लवों पे प्यास है l
किसे कहूँ, कैसे कहूँ मैं अपने मन की बात l l
कोई तो रास्ता सुझा दे मेरा,
एक राहनुमा की मुझे भी तलाश है l l


(इन रचनाओ पर आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए मार्गदर्शक बन सकती है, आप की प्रतिक्रिया के इंतजार में l)

गोकुल कुमार पटेल
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