Saturday, 4 May 2013

क्या? कभी? ऐसा? मेरा सपनों का गांव होगा?


क्या? कभी? ऐसा?
मेरा सपनों का गांव होगा?

साफ सुथरी होगी चहुँ ओर,
कही पर न गन्दगी होगा l
चिड़ियों की मधुर चहचाहट होगी
कदम-कदम पर वृक्षों का छांव होगा l l
सोना उगलेंगा तब धरती
मिटटी का न कहीं कटाव होगा l
चारों तरफ से शोंधी खुशबू आएगी,
हर घर में हलवा-पूरी, पुलाव होगा l l
न कोई रोयेगा, न कोई भूखे पेट सोयेगा
मीठी-मीठी नींद में सुनहरे सपने हर कोई संजोयेगा,
स्वच्छ जल होंगें, स्वच्छ गगन होगा l
स्वच्छ सड़कें होंगी, स्वच्छ जीवन होगा l l
शिक्षा का दीप जलेगा, बच्चे-बच्चियां सभी पढेंगे l
जाती-पाती, उंच-नीच के भेदभाव के बिना ये बढेंगें l l
न कोई भ्रष्ट होगा, न कोई भ्रष्टाचार होगा
न कोई शोषित होगा, न कोई धार्मिक व्यापार होगा
चारों तरफ खुशियों का उन्मुक्त बहाव होगा
क्या? कभी? ऐसा? मेरा सपनों का गांव होगा?



 (इन रचनाओ पर आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए मार्गदर्शक बन सकती है, आप की प्रतिक्रिया के इंतजार में l)

गोकुल कुमार पटेल

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