Friday, 2 January 2015

हिन्दू ! अपना वजूद खोते चले गए

हिन्दू ! अपना वजूद खोते चले गए














हमने कुछ किया नहीं,
ये सब तो अपने आप होते चले गए ।
निशक्त कमजोर जानकर हमने,
बस पनाह दिया था उन्हें,
आकर वे,
सबको माया ताल में डुबोते चले गए।
धन्य थी लालच की यह माया,
उस समय मेरे भी समझ में कुछ नहीं आया
धन लूटा, मन लूटा, लूटकर काया
वे सीने में खंजर चुभोते चले गए ।
रक्त रंजित था तलवार,
रक्त रंजित थी पृथ्वी की सारी सतह,
हर तरफ बिखरे थे नरमुंड,
घायलों की पीड़ा थी अथाह,
निस्सहाय होकर हम,
दुखो को आसुओं से भिगोते चले गए ।
वे छांट छांटकर काट रहे थे,
लूट कर हमसे सारा अन्न,
आपस में ही बाँट रहे थे,
निर्दयता से नोच नोचकर,
इज़्ज़त!
वे पापों के बीज बोते चले गए ।
कुछ को मार दिया गया,
कुछ भूख से मरने लगे,
आत्मरक्षा के खातिर,
हम भी,
अपना वजूद खोते चले गए ।
कोई ईसाई तो कोई मुस्लिम होते चले गए ।
सभ्यता को रौंदा गया,
संस्कृति भी दफन हो गया, 
अब तो हालात ऐसे है, 
भूलकर सबकुछ हम, 
कुसंस्कृति का बोझ ढोते चले गए।  



गोकुल कुमार पटेल


(इन रचनाओ पर आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए मार्गदर्शक बन सकती है, आप की प्रतिक्रिया के इंतजार में l)
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