Saturday, 8 June 2013

भ्रष्टाचार की जड़

भ्रष्टाचार की जड़

भ्रष्टाचार का वृक्ष,
इतना तब ही बढे है l
घोटालों की खाद लेकर,
सब लाइन से खड़े है l
तब उसकी बारी थी,
अब उसकी बारी है l
हर एक कदम में,
एक नई घोटालें की तैयारी है l
कहीं भगवा, कहीं सफ़ेद पोश है l
किसी के पास समंदर है,
किसी पास सिर्फ ओस है l
हालाँकि
ये सब पुरानी है,
इसमें न कोई बात नई है l
पर ये सच है कि -   
पलते-पलते वृक्ष,
आकाश छू गई है l
हर तरफ अब फैली है,
भ्रष्टाचार की छाया l
बाबाओं, नेताओं से पूछो
तो कहते है,
बेटा –
यहीं तो है महंगाई की माया l
जनता नादान है l
न किसी को होश है,
न किसी को ध्यान है l
क्योकि ये खाद,
किसी दुकान में नहीं बिकते है l
मिश्रित खाद बनाना तो
सब हमसे ही सिखते है l
सच्चाई यही है कि
इससे हम सब की चादर मैली है l
भ्रष्टाचार की जड़ इतना,
हमसे ही फैली है l


(इन रचनाओ पर आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए मार्गदर्शक बन सकती है, आप की प्रतिक्रिया के इंतजार में l)


गोकुल कुमार पटेल