Security

Tuesday, 2 March 2021

meeting

सभाएँ

सभाएँ हुआ करती थी कभी,
चौक में तो कभी अमीरों के आशियानों में।
जी हुजुरी करने वाले के गलियों में,
चबुतरों में तो कभी नेताओं के मकानों में।
और दब जाया करती थी न्याय भी,
अन्यायी, घमंडियों के ठौर ठिकानों में।
अब से इनकी गुहार नही लगाई जायेगी।
सच की आवाज भी नही दबाई जायेगी।
ये भवन सिर्फ ईट, पत्थरों का नहीं,
जिसे भ्रष्टाचारों की रंगो से पुताई जायेगी।
देखना प्रबल एकता की भावना से,
यहीं विकास की रणनीति बनाई जायेगी।
तब स्वच्छंद आकाश से आवाज बुलंद होगा,
देखना, देखना समाज ! कल से बेहतर आज होगा।

 
गोकुल कुमार पटेल

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English Translate:

 MEETING

There used to be meetings, sometimes
At times in the Chowk, in the homes of the rich.
In the street of a jealous person,
Sometimes in the houses of politicians, in the houses of the leaders.
And justice used to be subdued,
Unjust, in places of pride and pride.
From now on they will not be requested.
Even the voice of truth will not be suppressed.
These buildings are not just bricks, stones,
Which will be painted with colors of corruption.
Seeing a strong sense of unity,
This development strategy will be made here.
Then the voice will be elevated from the free sky,
See, see society! Today will be better than tomorrow.
 
 
Gokul Kumar Patel

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Awaiting

इंतजार














सूनी सडक, सूनी अमराईय्या,
चुप-चुप से कोई गीत गुनगुनाती है।
कभी आना इस सुनेपन के पल में,
देखना खामोशी से ये कैसे अपनापन जताती है।
झर-झर इसके भी आँखों से आँसू बहता है,
ये मैं नहीं इसका सुनापन कहता है।
कभी आना कोंडतराई के इस राह पर भी,
इसे भी हर पल तुम्हारा इंतजार रहता
है।
 
गोकुल कुमार पटेल
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English Translate:
 
AWAITING
 
A lonely road, a lonely Amaraiya,
Silently chants a song.
Sometimes come to this listening moment,
See how it expresses silence.
Tears also flow from its eyes,
This is not me, but it says the soundness of it.
Sometimes come on this road of Kondtarai,
This too awaits you every moment.
 
Gokul Kumar Patel
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Childhood friends

बचपन के दोस्त













बचपन में कुछ दोस्तों संग अकसर ही,
तालाब के एक घाट पर जाया करते थे।
बिना बुरे विचारों के लडका-लडकी,
सब एक साथ निर्वस्त्र नहाया करते थे।
एक-दूसरे पर हाथों से पानी छिडकते थे,
तो कभी-कभी मुँह से ही पींक लगाया करते थे।
सिखते थे तैरने का हूनर कई कलाबाजियों से,
तैर कर फिर खंभे तक तो कभी-कभी,
आर-पार भी जाया-आया करते थे।
बचपन में कुछ दोस्तों संग अकसर ही,
तालाब के एक घाट पर जाया करते थे।
बिना बुरे विचारों के लडका-लडकी,
सब एक साथ निर्वस्त्र नहाया करते थे।
कभी एक-दूसरे के कंधे से कूदते थे,
तो कभी बरगद,पीपल के टहनी से,
छलाँग लगाया करते थे।
दोस्ती के नाम पर फेंक देते थे,
वो दस पैसे का सिक्का,
ढूँढने के लिए डूबक-डूबककर,
फिर जी जान लगाया करते थे।
बचपन में कुछ दोस्तों संग अकसर ही,
तालाब के एक घाट पर जाया करते थे।
बिना बुरे विचारों के लडका-लडकी,
सब एक साथ निर्वस्त्र नहाया करते थे।
ठंडी में नहाने का मजा कुछ और था,
कभी हल्के-हल्के, कभी धीरे-धीरे,
पानी में कदम बढाया करते थे।
तो कभी किनारे से ही दौडकर,
पानी में छपाक से गिर जाया करते थे।
लुकाछुपी खेलते थे पानी के अंदर,
तो कभी कागज की नाव चलाया करते थे।
न सुर जानते थे, न ताल जानते थे,
पानी के ऊपर फिर भी थाप लगाया करते थे।
बचपन में कुछ दोस्तों संग अकसर ही,
तालाब के एक घाट पर जाया करते थे।
बिना बुरे विचारों के लडका-लडकी,
सब एक साथ निर्वस्त्र नहाया करते थे।
हम लोगों में तैरने की भी परीक्षा होती थी,
गणपति, दूर्गा पूजा के उत्सवों में अकसर,
एक नारियल के लिए सारे प्रतियोगी,
एक साथ तालाब में कूद जाया करते थे।
कोई भी जीते उससे फर्क नही पडता था,
क्योकिं नारियल को सब,
मिल बाँटकर ही खाया करते थे।
बचपन में कुछ दोस्तों संग अकसर ही,
तालाब के एक घाट पर जाया करते थे।
बिना बुरे विचारों के लडका-लडकी,
सब एक साथ निर्वस्त्र नहाया करते थे।
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गोकुल कुमार पटेल

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Sunday, 27 December 2020

FARMER'S BOY

मैं किसान का लड़का हूँ












ये मत समझना की ऐसे ही सरकारी नियमों पर भडका हूँ।

मैं बहुत कुछ जानता हूँ क्योकिं मैं किसान का लडका हूँ।

मैंने किसानों को उठते, बैठते, जागते और सोते देखा है।

मैंने किसानों को हँसते, गुनगुनाते तो कभी रोते देखा हैं।

पशुओं को अपनी संतान की तरह पालते देखा हैं।

गोबर को सर म़ें उठाकर ले जाकर गड्ढे में डालते देखा हैं।

बिना नाक ढके, बिना दास्तानें के उपले बनते देखा हैं।

हाथ, पैर के साथ शरीर और कपडों को गोबर से सनते देखा हैं।

कीचडों में सनकर, गंदगी में बैठकर सुखी रोटी खाते देखा हैं।

फावडा उठाकर,बारिश में भीगकर खेतों पर जाते देखा हैं।

कभी सुखे तो कभी गीले जमीन पर हल चलते देखा है।

जुती हुई धरती पर बीज बोकर फसल उगते देखा है।

कभी मुश्किलों से खरीदी महँगी बीज को सडते देखा हैं।

कभी छोटी-छोटी फसलों को बाढ के पानी में गलते देखा हैं।

दिन भर भुखे प्यासे खेतों में उनको काम करते देखा हैं।

कभी खडी फसलों में जानवरों के झुंड को चरते देखा हैं।

कभी बिजली के इंतजार में रात-रात भर जागते देखा है।

अनदेखा कर काँटों को मेड़ों पर बिना जुते के भागते देखा हैं।

कभी खाद तो कभी दवा के लिए कर्ज में डूबते देखा हैं।

नंगे पैरों में कंकड, पत्थर और काँटों को चुभते देखा हैं।

पकी फसलों को आग से धुँ धुँ करके जलते देखा है।

कर्ज के बोझ से दबकर घुँटते तो कभी मरते देखा हैं।

छोटी-छोटी जरुरतों के लिए उनके बच्चों ललचाते देखा हैं।

फटी कपड़ो को पहनकर उनको शर्माते सकुचाते देखा हैं।

नमक, मिर्च, प्याज और चाय में बासी रोटी खाते देखा हैं।

पुराने कपड़े से हर तीज त्यौहार की खुशियाँ मनाते देखा हैं।

अनाज को बेचने के लिए वेबस होकर लाइन में लगते देखा हैं।

बिचौलियों और दलालों की मन्नतें करते पाँव परते देखा हैं।

ठंडी-गर्मी में भी रात-दिन दो कपडों में ही कमाते देखा हैं।

इनकी मेहनत की कमाई पर दलालों को हक जमाते देखा हैं।

सुखा और बारिश के लिए भगवान को गुहारते देखा हैं।

अन्नदाता को हाथ जोडकर सबको जुहारते देखा हैं।

ये मत समझना साहब की मैं ऐसे ही सरकारी नियमों पर भडका हूँ।

मैं अब भी शांत, खामोश हूँ क्योकिं मैं जानता हूँ मैं किसान का लडका हूँ।

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गोकुल कुमार पटेल
(इन रचनाओ पर आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए मार्गदर्शक बन सकती है, आप की प्रतिक्रिया के इंतजार में।)

English Translate

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I AM A FARMER'S BOY


Do not understand that I have raged on similar government rules.

I know a lot because I am a farmer boy.

I have seen farmers getting up, sitting, awake and sleeping.

I have seen farmers laughing, humming and crying sometimes.

Have seen animals reared like their offspring.

I have seen cow dung lifted in the head and taken into the pit.

Without nose covering, Without tales, Have seen the formation of dung cake.

Have seen the body and clothes with hands, feet, and dung from dung.

Have seen sunbathing in mud, sitting in the dirty place and eating dry bread.

Having picked up the shovel and seen it going to the fields soaked in rain.

Sometimes I have seen dryness and sometimes I have seen plow on wet ground.

He has seen the crop growing by sowing seeds on the plowed soil.

Ever seen rotting expensive seeds bought with difficulty.

Sometimes small crops are seen melting in flood water.

They are seen working in the fields thirsty all day long.

Have ever seen herds of animals grazing in standing crops.

Have ever seen him awake throughout the night waiting for electricity.

Ignoring thorns, I have seen the thorns fleeing without razing.

Sometimes, he is seen drowning in debt for medicine.

Pebble, stone and barefoot, have seen prickles of thorns.

The ripe crops have been seen burning with smoke from the fire.

When seen under the burden of debt, we have seen him die sometimes.

They have seen their children tempted for small needs.

Wearing torn clothes, they are seen to be blushing.

Have seen stale bread in salt, pepper, onion and tea.

Every Teej with old clothes is seen celebrating the joys of the festival.

They have been seen in line to sell grains through the sites.

Middlemen and brokers have been seen making vows on their feet.

Even in cold summer, we are seen earning only two clothes day and night.

Brokers have been seen to claim their hard earned money.

Have seen God pleading for drought and rain.

Have seen Annadata waving hands with everyone.

Do not understand this, sir, I am bent on similar government rules.

I am still quite, silent because I know I am a farmer boy.

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Gokul Kumar Patel

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