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Tuesday, 15 May 2012

मुझे पप्पू बना दिया


मुझे पप्पू बना दिया

नाम कुछ और था, काम कुछ और था,
पर सबने मिलकर ,
काम कुछ और बता दिया,
नाम कुछ और बता दिया l
चीखता रहा चिल्लाता रहा,
पर सबने मिलकर ,
आख़िरकार,
मुझे अप्पू सा पप्पू बना दिया ll
फक्र था मुझे भी, अपने चरित्र पर,
बनाना चाहता था मैं भी, 
समाज के लिए प्रेरक,
पर सबने मिलकर,
न जाने ये कौन सा, रास्ता सुझा दिया l
शर्मसार हो रहा हूँ मैं,
सबने मिलकर,
आख़िरकार,
मुझे टपोरियों सा टप्पू बना दिया ll
स्वच्छ मन था बातों में वजन था,
शब्दों में जान थी समाज में मान था,
पर अर्थ का अनर्थ बताकर ,
सबने ये क्या पाठ पढ़ा दिया l 
दोअर्थी सी बातें है अब मेरी,
सबने मिलकर,
आख़िरकार,
मुझे गोल गोल घूमने वाला लट्टू बना दिया ll
चापलूसी से दूर भागते भागते, 
पिछड़ तो गया था मैं,
पर आगे बढ़ने की होड़ में,
सबने मिलकर,
आख़िरकार,
जी हजुरी करने वाला,
आगे पीछे घूमने वाला,
मुझे चम्मचों सा चप्पू बना दिया ll 


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Monday, 14 May 2012

धन क्यों कमायेगा



धन क्यों कमायेगा














धन क्यों कमायेगा, 
किसका हुआ है धन,
जो तेरा साथ निभायेगा l
चिपकाये रहेगा जीवन भर,
अंत में वो ही तेरा साथ छोड़ जायेगा l
अधिक हुआ धन अगर,
पहले पहल सारी दुनियाँ, 
कुत्ते सा पूंछ हिलायेगा l
लालच फैलेगा अपनो में,
चोर डाकू के साथ साथ, 
सगे सम्बन्धी भी दुश्मन बन जायेगा l
धन देगा तब तक याद करेंगे, 
मरने पर तेरे, 
सब कुछ भूल जायेगा l
सड जाएगी लाश तेरी, 
जमीन पर पड़ी पड़ी,
बेटे भी पर पहले,
धन का बँटवारा करवायेगा l
इसीलिए कहता हूँ, 
धन तू क्यों कमायेगा l
किसका हुआ है धन, 
जो तेरा साथ निभायेगा l
धन के बदले अगर, 
प्यार जो तू कमायेगा l
प्रेम फैलाकर दुनिया में, 
सबको अपना बनायेगा l
जितना बांटेगा उतना फैलेगा, 
चोर डाकू भी चीन नहीं पायेगा l
सत्य अहिंसा को अपनायेगा तो, 
महात्मा सा बन जायेगा l
सबके जुबां पर होगा नाम तेरा,
मरने पर अमर तू कहलायेगा l
इसीलिए कहता हूँ, 
धन तू क्यों कमायेगा l
किसका हुआ है धन, 
जो तेरा साथ निभायेगा l


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Thursday, 10 May 2012

नन्हा फ़रिश्ता


नन्हा फ़रिश्ता

प्यार का बनाने एक नया रिश्ता,
आया आया एक नन्हा फ़रिश्ता l
साथ अपने वो बहार लाया,
मुठ्ठी में समेटे प्यार लाया l
आँखे है उसके बड़े प्यारे,
चमके जैसे हो चाँद सितारे l
देख देखकर हमको वो तो,
कभी रोता तो कभी है वो हँसता l 
प्यार का बनाने एक नया रिश्ता,
आया आया एक नन्हा फ़रिश्ता ll
पालने में माँ जब उसको सुलाए,
देख देखकर मन अपना बहलाये l
प्यार से जब उसको पापा सहलाये,
फिर भी मुन्ना कह नहीं पाया l
पापा पापा चाकलेट क्यों नहीं लाये,
दादा दादी लेते बलाएँ,
कुछ न जब उनको सूझता l
प्यार का बनाने एक नया रिश्ता,
आया आया एक नन्हा फ़रिश्ता ll
फूलो सा महके है वो तो,
हवा उसकी महक चुराता l
घर आँगन में उसको फैलाता,
मन में नया उमंग जगाता l
झुक जाती शरमाकर फूलों की डाली,
मंद मंद मुस्कुराते जब वो दिखता l
प्यार का बनाने एक नया रिश्ता,
आया आया एक नन्हा फ़रिश्ता ll





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Tuesday, 8 May 2012

बिजली की आंखमिचौली


बिजली की आंखमिचौली 

शक्ति का रूप वह,
बिन आग के भी है वो जली,
हर तरफ फैला है जो,
नाम उसका है बिजली l
रात में जब बंद हो जाती है रौशनी,
बढ़ जाती है सबकी परेशानी l
बंद हो जाती है जब टी.वी. ,
गुस्से होते है बच्चे बीबी l
कड़ककर कहती है नहीं चल रहा है पम्प हीटर,
खाना नहीं मिलेगा बिछा लो बिस्तर l
मैं बहुत धीमे से कहता हूँ,
नहीं चल रहा है जब हीटर और पम्प l
हैण्ड पम्प से मटका भर,
लकड़ी से खाना बनाने का अपना लो ढंग l
चीखकर वो कहती है,
क्या कहा?
एक भी दिन हमने ठीक से बिजली पाई है l
नहीं जानते?
हर महीने कितने रुपये बिजली बिल पटाई है l
उसके गुस्से के डर से चुपचाप रहता हूँ l
वो बोलती है और मैं कुछ नहीं कहता हूँ l
उसका पक्ष लेकर कहूँ तो, 
मुझे जोरू का गुलाम कहेगें l
पर जरा सोचो?
बिजली के बिना हम कैसे रहेंगे l
कब तक, आखिर कब तक हम अन्याय सहेंगे l
तब तक अन्याय होगा, 
जब तक हम कुछ नहीं कहेंगे l


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Monday, 7 May 2012

सपना है या अनुभूति - 1


सपना है या अनुभूति - 1

वह पल रह रह कर मेरे स्मृति को विस्मित कर रहा था उस रात अचानक मेरी आँख खुल गई थी, मेरा मन विचलित हुआ जा रहा था, मैंने उठ कर दरवाजा खोला और नजरें घुमाकर कर जायजा लिया तो देखा की सब कुछ मौन है l  झींगुर  की भी आवाज  कानों  तक  नहीं पहुँच पा रही थी पता नहीं क्यों आज सब चुप से दुबके हुए थे और चारों ओर सन्नाटा ही सन्नाटा छाया हुआ था l

मैं जैसे ही दरवाजा बंद करके पलटा तब मुझे पहली बार उस गहरी अन्धकार का साक्षात्कार हुआ, प्रकृति की वह चकाचौंध जो मैंने दिन के उजाले में देखी थी विलुप्त हो चुकी थी, ऐसा लग रहा था मानों पूरा आकाश मंडल ही राहू का ग्रास हो गया हो, वह चिर अन्धकार मेरे मन को झकझोर कर रख दिया, मन में भय की एक लकीर खिचतीं सी चली गई, पर पता नहीं क्यों उस भय से मैं विचलित नहीं हुआ, कोई शक्ति थी कोई आवाज थी जो मुझे उस अन्धकार की तरफ खींच रही थी और मैं चाह कर भी अपने आप को रोक नहीं पा रहा था आख़िरकार माँ और सदगुरुदेवजी को मन ही मन याद कर मैं उस काले समंदर में कदम बढ़ा ही दिया जहाँ से न तो मंजिल ही दिख रही थी और न ही रास्तों का कुछ पता लग रहा था, कुछ देर मैं यु ही दिशाहीन भटकता रहा, चलता रहा पर अचानक पता नहीं कैसे मेरे पैरों में गजब की स्फूर्ति आ गई, पैर जमीं पर टिक नहीं रहे थे मेरे रफ़्तार में तेजी आ गई थी मैं पूरी वेग से दौड़ता चला जा रहा था, दौड़ता चला जा रहा था यु ही कब तक दौड़ता रहा उसका मुझे कोई होश नहीं थाl

अब मेरी धड़कन जोर जोर से धडक रहा था पूरा शरीर थकान से निढाल हुआ जा रहा था, सारा अंग मन से विश्राम की अनुमति मांग रहा था, पर मन पर न जाने क्या धुन सवार था की उनकी बातों को स्वीकार करने को तैयार ही नहीं था अंतत: सारा शरीर निढाल होकर ढीला पड़ गया और एक पेड़ के समीप गिर पड़ा, कुछ देर बाद आँखों ने हरकत की नजर घुमा कर देखा तो एक प्रकाश पुंज अँधेरे को चीरते हुए मेरे आँखों से टकरा रही थी मैं सहसा उठा और उस प्रकाश की दिशा में दौड़ने लगा ज्यों-ज्यों मैं आगे बढ रहा था वह प्रकाश बढ़ता जा रहा था धीरे-धीरे उस प्रकाश ने मुझे अपने में समाहित कर लिया, अब मैं एक मंदिर के सामने था अखंड सूर्य से प्रकाशित स्वच्छ सफ़ेद मंदिर मुझे आलौकिक आनंद की अनुभूति करा रहा था, मेरी जिज्ञासा बढ रही थी और उस जिज्ञासा ने मुझे अन्दर प्रवेश करने से रोक नहीं पाया l सीढियाँ चढ़ते-चढ़ते मैं दरवाजे के पास पहुंचा, दरवाजा बंद था मैंने आँखें बंद कर के एक बार फिर से माँ और गुरूजी स्मरण किया l और ऊपर लटकती हुई घंटी को बजा कर दरवाजा खोलने के लिए जैसे ही कदम बढ़ाया सहसा मेरे मुख से एक चीख निकल पड़ी मेरा पैर किसी वस्तु से टकराया था जिसकी मैंने कल्पना ही नहीं की थी मैंने नीचे नजर झुकाई तो देखा की एक नरमुंड पड़ा है मेरे मन में भय की पुनरावृति हो गई, भय से बचाव के लिए मैंने इधर उधर नजरें दौड़ाई तो देखा सैकड़ों नरमुंड ऐसे ही यत्र-तत्र बिखरे पड़े है उस नज़ारे को देख कर मैं इतना भयभीत हुआ की भय ने मुझे झकझोर कर रख दिया l मेरे मुंह से चींख निकल गई और मैं आँखें खोलते हुए उठ बैठा l

देखा - मैं बिस्तर में बैठा हुआ हूँ, तब मुझे एहसास हुआ की यह मेरी निंद्रा अवस्था की सोच थी, मात्र एक सपना था, पर कहते है की सपने अक्सर किसी घटना से जुड़े होते है पता नहीं यह कहाँ तक सच है?  मैं नहीं जानता? पर कभी-कभी यह प्रश्न आज भी मेरे जहन में उठता है की? वह कौन सी शक्ति थी जो मुझे खींच रही थी?  कही वो सदगुरुदेव की आवाज तो नहीं थी जो मुझे खींच रही थी? वह शक्ति मुझे क्यों खीच रही थी? आखिर वह शक्ति मुझे क्या याद दिलाना चाह रही थी? क्या यह मेरे पिछले जन्म की कोई घटना थी?  पिछले जन्म में मैं कौन था? मैं वहां क्यों और कैसे पंहुचा था?  या यह आने वाली कोई घटना से मुझे अवगत करा रही थी? 

इन्ही सारे सवालों की जवाब ढुंढने की कोशिश में.............


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Friday, 13 April 2012

दिन



दिन

सुबह हुआ सूरज निकला,
सबेरे सबेरे तालाब में फुल खिला l
भौंरें भी गुनगुनाने लगे,
गाने लगे प्यार के तराने l
सूरज की किरणों से धरा हुई सरोबोर,
शुरू करने लगे सब अपना कारोबार l
बजने लगी मंदिर की घंटी,
माँ चिल्लाने लगी उठो, पिंकी बंटी l
सुबह सुबह दरवाजे पर फेंक दिया अखबार,
नहा धोकर हो जाओ तैयार l
करके प्रभु को प्रणाम,
करो शुरू तुम अपना काम l
काम में हो के तुम लीन,
फुर्ती से गुजारो अपना दिन l
दिन को हर पल बर्फ जैसे पिघलना है,
समय की हर कड़ियों को हमें मजबूती से पकड़ना है l
शाम हुई अब तो, सूरज को भी ढलना है ,
चलो घर चले, कल फिर हमें अपना काम करना है l


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Wednesday, 11 April 2012

माही


     माही


विश्वकर्मा पूजन के एक दिन पूर्व l
खुशियाँ मिली हमें अपूर्व ll
१६ सितम्बर २००९ की रात l
शंकित से बैठे थे सब एक साथ ll
अजीब सी बेचैनी थी, अजीब सा हाल था l
दिन ढल चुकी थी बज गए थे सातll
परिचायिका ने आकर कही ये बात l
रिश्तो की मिली है हमें अनूठी सौगात ll
खुशियाँ लेकर गुडिया आई है l
मुट्ठी में समेटकर प्यार लाई है ll
सबकी लाडली  बिटिया प्यारी l
तारों सी चमके आँखें तुम्हारी ll
गुलाब की कोमल नाजुक सी कली l
हँसे तो टपके मिश्री की डली ll
मनमोहक सी तुम्हारी शोख अदाएं l
देखकर लेते सब तुम्हारी बलाएँ ll
सबकी आशीष और दुआ ऐसा काम करेगी l
कलेक्टर बनकर तू दुनियां में नाम करेगी ll
बढ़ायेगी तू माँ बाप की आन बान शान l
प्यार से मिलकर सबने रखा माही उसका नाम ll

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Tuesday, 10 April 2012

White Palash


सफेद पलाश 



पलाश का वृक्ष वैसे तो सर्वत्र पाया जाता है, यह एक मध्यम आकार का वृक्ष है इसके तने की छाल मोटी और गांठदार होती है, नई-नई शाखाएं रोम युक्त होती है, पत्ते हरे हरे मोटे गोलनुमा तथा तीन तीन पत्तो के समूह में विभक्त रहते हैं। पलाश तीन प्रकार का होता है। एक तो गहरे लाल नारंगी रंग के फूलों वाला, दूसरा पीले रंग के फूलों वाला और तीसरा सफेद रंग के फूलों वाला, सफेद फूलों वाला पलाश अब दुर्लभ हो चला है और कहीं कहीं बड़ी मुश्किल से ही दिखाई पड़ते है। सफेद फूलों वाले पलाश को औषधीय दृष्टिकोण से अधिक उपयोगी माना जाता है। पलाश को हिंदी में ढाक, टेसू छत्तीसगढ़ी में परसा तथा उड़िया में पोरासु कहा जाता है। 

माघ माह में ऋतुराज वसंत का जैसे जैसे आगमन होता है वैसे ही पलाश की शाखाओं पर काले रंगों का पुष्प कलिकाएँ गुच्छों के रूप में प्रकट होने लगते है। फुल तोते की चोंच की तरह टेढा तथा दूर से देखने पर आग की लपटों की जैसे दिखाई पड़ती है। फागुन में जहाँ सारे लोग भेदभाव मिटाकर रंगों से बसंत का त्यौहार होली मानते है, तो पलाश का यह वृक्ष भी फूलों की चादर ओढ़ प्रकृति को रंगीन कर होलिकोत्सव में शामिल हो जाता है ।

  
आध्यात्मिक और धार्मिक दृष्टि से हिन्दू धर्म में पलाश के वृक्ष का बहुत महत्व है इसके वृक्ष को ब्रम्हा विष्णु व महेश का निवास स्थान माना जाता है कार्तिक माह में इसके सूखे हुए फुल देवी देवताओं को चढ़ाया जाता है तथा लकड़ी से हवन करना भी सर्वोतम माना जाता है । पलाश के पत्तों का उपयोग पत्तल और दोने बनाने में भी खूब किया जाता है।

तांत्रिक क्रियाओं में पलाश के फूलों से तांबे को सोना बनाना, लक्ष्मी प्राप्ति की साधनाएँ तथा इसके कल्प से शरीर का कायाकल्प करना व त्रिकालदर्शी साधनाओं (तीनो कालों वर्तमान भुत व भविष्य को जानने वाला) की पद्धतियों का वर्णन भी किया गया है।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से भी पलाश के अनेक गुण बताए गए हैं और इसके फूल, बीज और जड़ से अनेक प्रकार की दवाइयां बनायी जाती है इसके फूलो से होली के रंग तैयार किये जाते हैं जो त्वचा के लिए काफी लाभप्रद होता है। जहाँ एक ओर बीज और जड़ से पुरुषों के नपुंसकता का इलाज होता है, तो दूसरी ओर इससे महिलाओं के बाँझपन और मासिकस्त्राव सम्बन्धी अनियमितताओं के लिए दवाइयां भी बनायीं जाती है।


सामान्य तौर पर लाल पीले रंग के पलाश के वृक्ष और सफ़ेद पलाश के वृक्ष में अंतर सिर्फ फूलों को ही देखकर किया जाता है पर हम अगर ध्यान से देखे तो पायेंगें की सफ़ेद पलाश के वृक्ष के डंठल और तने के मध्य एक उठा हुआ भाग दिखाई देता है जिसे शिवलिंग कहते है।  यह  चिन्ह सिर्फ सफ़ेद पलाश के वृक्ष में पाया जाता है, लाल व पीले रंग के पलाश के वृक्ष में नहीं जिसे देख कर हम सफ़ेद पलाश के वृक्ष की पहचान कर सकते है।  

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Sunday, 1 April 2012

गए ये कैसे भूल


गए ये कैसे भूल


हँसना भुला दिया है तुम्हारी खौप ने,
वीरान सा बना दिया है गुलशन को,
बहारें ही न हो गुलशन में, 
तो कैसे खिलेंगें, कैसे महकेंगें फुल l
तुम्हारे ही डर से नहीं खिल रहे है फुल l
गए ये कैसे भूल ll
अधिकारों कर्तव्यों से मुह मोड़कर, 
जाने किस सिद्धांतों में उन्मत हो, 
संस्कृतियों को रौंद रहे हो अपने ही पैरो से, 
पूरा देश आतंकित है तुम्हारे आंतकों से,
तुम्ही ने गन्दा किया है समाज को,
और उड़ा रहे हो दुश्मनी का धुल l  
गए ये कैसे भूल ll
गाँधी, सुभाष और जवाहर मिट गए है,
तो समझते हो, हो गया गुंडाराज,
भूल गए उन जवानों को,
जिनको है आज भी देश पर नाज,
तेरे चहरे को भी वो पहचान गए है, 
कत्लेआम वो भी कर सकते है, 
पर उन्हें देश से प्यार है, 
चुप है तो बस इसलिए, 
क्योकि उन्हें समय का इंतजार है, 
चुभ रहे हो सीने में, तुम्ही बन के शूल l  
गए ये कैसे भूल ll
मत भूलो जिस शक्ति, जिस जवानी का तुम्हे घमंड है,
वो सिर्फ दो दिन का मेहमान है,
ढली जवानी हो जाओगे बरबाद,
अब भी समय है तुम्हारे पास,
बदल दो अपने आप को, बदल दो गन्दा समाज,
सब रहो मिलजुल, 
विद्रोह, दुश्मनी जाओ तुम भूल l
तुम ही तो हो इस देश का,
परिवार, कुटुंब और कुल, 
गए ये कैसे भूल ll



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Thursday, 2 February 2012

अफवाहें


अफवाहें 
ये अफवाहें कहाँ से आती हैl
ये अफवाहें कहाँ को जाती है ll
ये अफवाहें क्या क्या लाती है l
ये अफवाहें क्या क्या ले जाती है ll
अफवाहें लाना लोग शान समझते है l
बेरोजगारी से अच्छा इसे काम समझते है ll
सर्वब्यापी, निराकार अफवाहें l
मन से टकराती निराधार अफवाहें ll
ग़मों की रानी गमगीन अफवाहें l
दीवानी, फौजदारी सी संगीन अफवाहें ll
ये अफवाहें चारी चुगली से जनी है l
ये अफवाहें विश्वास की कमी और मैं से सनी है ll
ये अफवाहें आँख से मुहं, मुहं से कान तक जाती है l
ये अफवाहें दिल की धड़कन ऐसी, इससे जान तक जाती है ll
ये अफवाहें अकेलापन, उदासी और बेचैनी लाती है l
ये अफवाहें सुख, शांति और चैन ले जाती है ll
ये अफवाहें सांसों को कलुषित कर जाती है l
ये अफवाहें समाज को दूषित कर जाती है ll
ये अफवाहें मानव की जिन्दगानी है l
ये अफवाहें ही शायद युग परिवर्तन की निशानी है ll

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भगवान


भगवान

दुनियां में सबसे बड़ी उसकी हसती है l
सबके दिलो में भी वो बसती है l
सब हीरे मोती से उसे जड़ते है l
हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई,
उसी के लिए लड़ते है l
जिसका न कोई आकार है ,
न कोई प्रकार है l
वो तो सर्वव्यापी,
निराधार और निराकार है l
उसकी सब जगह,
अलग अलग पहचान है l
पर वो तो एक,
और सिर्फ एक भगवान है l

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Friday, 27 January 2012

न्यायमूर्ति


 न्यायमूर्ति

मुख से कुछ नहीं बोलती है,
फैसलों को सिर्फ सबूतों से तौलती है l
आँखों में बंधी पट्टी है,
उस पर लगी मिट्टी है l
पट्टी को नहीं उतारती है,
मिट्टी को नहीं झाड़ती है l
न्यायी को न्याय देकर,
अन्यायी को सदा पछाड़ती है l
उसके आगे हाथ सबकी जुड़ती है,
वो इंसाफ की देवी, और न्याय की मूर्ति है l


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रात


रात

गाँठ बांध ले जो मैं कहता,
प्रेरणा वाली ये बात है l
पल भर में जितनी खुशियाँ,
लुट सको लुट लो,
क्योकि दुनियां से जीवन का,
पल भर का साथ है l
सुख लगेगा तुम्हे,
दिन का दमकता सूरज,
पर दुःख तो अँधेरी रात है l
फूँक फूँक कर,
रखना पड़ेगा पांव तुझे,
तेरे हर कदम पर,
दुश्मन लगाये घात है l
काम, क्रोध, लोभ, मोह,
ये सब है सांसारिक माया,
जिसका कोई रंग न रूप,
वेश न भूषा,
न कोई जात है l
संभल जा अब तो, 
बचा ले डूबने से,
संभलना तेरे ही हाथ है l
बच गया इनसे तो,
निश्वार्थ प्यार की रौशनी फैलेगा,
नहीं तो दिन भी तेरे लिए,
                        अमावस्या की काली रात है l




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Monday, 23 January 2012

गोकुल की नगरी


गोकुल की नगरी

जहाँ ग्वाल बाल की टोलियाँ,
जहाँ छलकती है गोपियों की गगरी,
वो है गोकुल की नगरी l
जहाँ पवित्र नदियाँ जमुना की,
जहाँ ठंडी ठंडी कदम की छांव,
वो है गोकुल का गांव l
जहाँ दूध की धारा बहती है,
जहाँ मिलता है आम, अमरूद और जाम,
वो है गोकुल का ग्राम l
जहाँ ऊँचे ऊँचे पर्वत है,
जहाँ पतली पतली सी है डगर,
वो है गोकुल का नगर l
जहाँ परम के दीवाने सभी,
जहाँ रंग बिरंगे उनके भेष,
वो है गोकुल का देश l

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Sunday, 22 January 2012

चांदनी


चांदनी

चाँद ने जब अपनी चांदनी फैलाई l
सुबह समझकर उल्लू बोला,
रातरानी भी भूल से खिल आई l
झिंगरा अब मधुर तान सुनाती,
चाँद शरमाकर तब बादलों में छिप जाती l
लुका छुपी का ये खेल निराले,
आँखे फाड़े देख रहे थे तारे l
निकल पड़े जानवर सभी अपने काम से,
सो रहा था पर इन्सान आराम से l


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Friday, 20 January 2012

निशा का प्रेम


निशा का प्रेम

एक दिन जब मैंने,
जलाई प्यार से ज्योति l
देखा छिपकर निशा को रोती l
मैंने उससे पूछा?
निशा तू क्यों है रोती l
सिसक सिसककर निशा बोली,
मेरी प्रिय सखी, सहेली ज्योति l
दोनों ही खेलने आते,
लेकर हाथों में हाथ l
समय बिताते दोनों साथ ही साथ l
सुख दुःख में भी,
हमेशा साथ रहते l
सब हमको दो बहने ही कहते l
सबके दुखो को वो हरती,
जीवन में खुशियों को भरती l
पर जबसे तुमने ज्योति जलाई है l
मेरे मन में एक डर सी समाई है l
आंधी और तूफां से,
कही ज्योति बुझ न जायेगी l
हर यादें तब,
मुझे हर पल तडपायेगी l
मैंने जब हाथ फेरा,
उसके बालो पर l
देखा निरंतर लुढ़क रहे थे,
आश्रू धारा उसके गालो पर l
आंसुओं को पोछकर,
कहा थोडा सोचकर l
जब कभी ज्योति बुझ जायेगी l
तन्हाई तडपायेगी l
तेरे मन की डोर से बंध,
फिर आऊंगा l
बिराने में फिर से मैं,
प्यार की ज्योति जलाऊंगा l


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