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Wednesday, 22 May 2013

“एक राहनुमा की मुझे तलाश है”

“एक राहनुमा की मुझे तलाश है”

किसे कहूँ मैं अपने मन की बात l
कैसे कहूँ मैं अपने मन की बात l l
कोई समझता नहीं,
कोई समझने की कोशिश करता नहीं l
सरपट भाग रहे है अंधेरों में,
राहों से भटक कर,
एक पल के लिए कोई ठहरता नहीं l l
कभी तो थकेंगें, कभी तो रुकेंगे,
ये मैंने जाना है l
उनके पीछे पीछे दौड़ रहा हूँ,
मैंने हार नहीं माना है l l
कब तक दौड़ता रहूँगा,
उनके पीछे,
अनजानी ये आस है l
तब भी समय न उनके पास था, 
न अब ही समय उनके पास है l l
अब तो भागते भागते,
खुद ही भटक गया हूँ,
आँखें है पथराई, लवों पे प्यास है l
किसे कहूँ, कैसे कहूँ मैं अपने मन की बात l l
कोई तो रास्ता सुझा दे मेरा,
एक राहनुमा की मुझे भी तलाश है l l


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गोकुल कुमार पटेल

Saturday, 4 May 2013

क्या? कभी? ऐसा? मेरा सपनों का गांव होगा?


क्या? कभी? ऐसा?
मेरा सपनों का गांव होगा?

साफ सुथरी होगी चहुँ ओर,
कही पर न गन्दगी होगा l
चिड़ियों की मधुर चहचाहट होगी
कदम-कदम पर वृक्षों का छांव होगा l l
सोना उगलेंगा तब धरती
मिटटी का न कहीं कटाव होगा l
चारों तरफ से शोंधी खुशबू आएगी,
हर घर में हलवा-पूरी, पुलाव होगा l l
न कोई रोयेगा, न कोई भूखे पेट सोयेगा
मीठी-मीठी नींद में सुनहरे सपने हर कोई संजोयेगा,
स्वच्छ जल होंगें, स्वच्छ गगन होगा l
स्वच्छ सड़कें होंगी, स्वच्छ जीवन होगा l l
शिक्षा का दीप जलेगा, बच्चे-बच्चियां सभी पढेंगे l
जाती-पाती, उंच-नीच के भेदभाव के बिना ये बढेंगें l l
न कोई भ्रष्ट होगा, न कोई भ्रष्टाचार होगा
न कोई शोषित होगा, न कोई धार्मिक व्यापार होगा
चारों तरफ खुशियों का उन्मुक्त बहाव होगा
क्या? कभी? ऐसा? मेरा सपनों का गांव होगा?



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गोकुल कुमार पटेल

Wednesday, 3 April 2013

राम भक्ति


राम भक्ति


ज्ञानियों के मन को ,राम नाम भाया है l
सबके जुबान पर भी, राम नाम आया है l l
एक राम नाम सच्चा जग में, बाकि सब मोह माया है l
निराकार, निराधार वो तो, कण कण में समाया है l l
ज्ञानियों के मन को ………………………………….……… कण कण में समाया है l l

मतकर घमंड इस तन पर, मिटटी का बना ये काया है l
प्रभु ने इसको कभी एक पल में बनाया, तो कभी एक पल में मिटाया है l l
ज्ञानियों के मन को ………………………………….……… कण कण में समाया है l l

झूटी शान के मोह में फंसकर, तूने कितना धन कमाया है l
यहाँ से लेकर वहां तक की, धरती को अपना बताया है l l
तुझे जरुरत है पांच फिट जमीं की ही, ज्ञान कर ऐ मुरख ये सब अपना नहीं पराया है l
ज्ञानियों के मन को ………………………………….……… कण कण में समाया है l l

सब कुछ तो मिल जाता है,यहाँ मोलने में l
कम ही होता है, अकसर वो तौलने में l l
एक नाम को तौल कर देखो, नित नित बढ़ता जाता है,
अब तक सबने सब को दिया, फिर भी दाम किसी ने नहीं लगाया है l
ज्ञानियों के मन को ………………………………….……… कण कण में समाया है l l

दुखो से लड़कर जीने का आस वो देता है l
निर्बुद्धि को भी ज्ञान का प्रकाश वो देता है l l
कभी घबराना नहीं, तेरे सर पर राम का साया है l
ज्ञानियों के मन को ………………………………….……… कण कण में समाया है l l


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गोकुल कुमार पटेल

Saturday, 16 March 2013

सपना है या अनुभूति - 9


सपना है या अनुभूति - 9

प्रकृति के संतुलन को बनाये रखने में पेड़ पौधों का जितना योगदान है उसकी व्याख्या कर पाना असंभव है l पेड़ पौधों से धरा जब सजती है तो पकृति का हर प्राणी मन्त्रमुग्ध हो उसकी खूबसूरती की ओर सहज ही खींचे चले आते हैl कहा जाता है पृथ्वी में जितने प्रकार के जीव जन्तु है उतनी ही प्रकार के  पेड़ पौधे की किस्में भी पाई जाती है  देखा जाये तो हर एक कदम पर एक नए किस्म के पेड़-पौधे देखने को मिल जाती है l जब भी कोई नया किस्म का पेड़ पौधे मिल जाये तो बरबस ही निगाहे उसकी और खींची चली जाती है l ऐसा ही मेरे साथ हुआ हमारे गांव के तालाब के मेढ़ पर एक नया किस्म का पेड़ उग आया था और मेरी निगाहे हमेशा उसकी और टकटकी लगाये रहती थी l कई लोगो से मैंने पूछा की यह कौन सा पेड़ है? पर कोई इसे जामुन कहता, कोई इसे चीकू बताता, कोई इसे आम का पेड़ ही कहता था l तो कोई इसे जंगली पेड़ है कहकर चलता बनता था l सबके अलग-अलग जबाब से मैं परेशान हो गया l इसीलिए अब तो बाकि लोगो से मैंने पूछना ही छोड़ दिया l लेकिन मन है की मानता ही नहीं था l  आते जाते रह रहकर मेरी आँखें उस तरफ चली ही जाती थी और मैं मन मसोसकर रह जाता था l किसी को यह नहीं पता था कि यह कौन सा पेड़ है तो इसे यहाँ लगाया किसने? या फिर यह यहाँ आया कैसे? कई इस तरह के सवाल थे जिनका जबाब मुझे नहीं मिल पा रह था l जब भी मेरी नजर उस पेड़ कि तरफ जाती मैं बेचैन हो उठता था लेकिन मैं यह भी समझ गया था की इसका जबाब कोई नहीं दे सकता है और जब तक इसमें फुल या फल नहीं लग जाते तब तक इसके बारे मैं पता भी नहीं लगाया जा सकता है l इसलिए मैंने मन में ठान लिया कि मैं इंतजार करूँगा तब तक, जब तक इसमें फुल और फल नहीं लग जाते l 

मौसम करवट बदल रहा था, बसंत आ रहे थे, जा रहे थे,  पतझड़ आ रहे थे, जा रहे थे ऐसे करते-करते न जाने कितने साल व्यतीत हो गए l  वह छोटा सा पौधा अब पेड़ बन गया था लेकिन कभी ऐसा नहीं हुआ कि मेरी निगाहें उस पर न पड़ी हो l एक दिन मैं उसके पास से गुजर रहा था कि मेरे पैर अचानक से रुक गए आखें खुली कि खुली ही रह गई l धड़कन तेज चलने लगी होंठों पर एक मुस्कान तैरने लगी और मन कहने लगा कि अब मेरा इंतजार ख़त्म होने वाला है उस पेड़ कि टहनियों पर काली-काली, पतली-पतली, लम्बी-लम्बी रेशा युक्त टहनी निकल आये थे जो मेरी जिज्ञासा और बढ़ा रहे थे l क्योकि मुझे पता नहीं चल पा रहा था कि ये फुल है या फल, बहरहाल सब्र कर रहा था कि इंतजार करते-करते इतने दिन हो गए है तो कुछ दिन और सही, जैसे -जैसे दिन पर दिन बीत रहा था उन पतली टहनियों पर धीरे-धीरे काली-काली कलियों का आगमन हो रहा था l पर पता नहीं मेरी बेचैनी थी  या फिर कलियों का विकास ही रुक गया था, क्योकि सामान्यतः सभी पेड़-पौधों में कलियों से फुल खिलने में तीन से चार दिन लगता है पर यहाँ तो एक सप्ताह बीत गया था लेकिन उन कलियों में फुल नहीं आया था l शनैः -शनैः समय का चक्र चलता जा रहा था और दस दिन बीत जाने के बाद अब जाकर कहीं उन कलियों पर गुलाबी रंग के छोटे-छोटे पंखुड़ियों का आगमन हो रहा था l

अब तक गांवों में वह पेड़ कौतुहल का विषय बन गया था सभी आपस में चर्चा कर रहे थे कि यह कौन सा पेड़ होगा l ऐसा पेड़ तो कहीं देखा ही नहीं है, तो कोई कह रहा था कि देखा क्या मैं तो कहता हूँ ऐसा पेड़ कहीं है ही नहीं l पंखुडियां बढ़ गई पर पूरी तरह से फुल नहीं बन पाई l  कुछ दिन बाद मैंने देखा की वे गुलाबी-गुलाबी पंखुडियां नीचे गिरे पड़े है मेरी नजर ऊपर टहनियों की तरफ गई तो मैं असमंजस में पड़ गया क्योकि पंखुड़ियों के नीचे का काला सिरा जिससे फल बनाना चाहिए था गायब है l  मेरी नजर पुनः नीचे जमीन पर आकर इधर-उधर वह काला वाला हिस्सा तलाशने लगी की वह हिस्सा कहीं तो मिलेगा पर सारी मेहनत बेकार वहां कुछ रहेगा तो ही तो कुछ मिलेगा l  तो फिर आख़िरकार वह हिस्सा गया कहाँ? क्या उसे कोई और उठा कर ले गया? पर इतनी सुबह तो कोई उठता नहीं है फिर कैसे कोई ले जा सकता है l मेरे मन में ऐसे ही कुछ सवाल घर कर गए l मैंने सोचा की आज रात मुझे यही रहकर देखना पड़ेगा की पंखुडियां ही गिरती है या पंखुड़ियों के साथ फल भी गिरता है l और पंखुड़ियों के साथ फल गिरता है तो जाता कहाँ है?

शाम होते ही आज मैंने जल्दी खाना खा लिया और एक पानी का बोतल लेकर उसी पेड़ के समीप स्थित मंदिर के आड़ में दुबककर बैठ गया l चांदनी रात थी,  फिर भी मुझे डर लग रहा था क्योकि साथ देने के लिए मेरे साथ कोई नहीं था  चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ था और अब जाकर मुझे अपनी गलती का एहसास होने लगा था l  सोच रहा था कि साथ में किसी दोस्त को भी ले आना चाहिए था l लेकिन लाता भी किसे क्योकि सभी दोस्तों को मैं बखूबी जानता था मेरे लाख कहने पर भी सभी कोई न कोई बहाना बना कर मुकर जाते l पर कोशिश तो करनी ही चाहिए था मैंने तो वो भी नहीं की और अब पछताने से क्या लाभ जब चिड़िया चुक गई खेत l झींगुर की आवाज और निशाचरों  की चलने की सरसराहट ने माहौल को डरावना बना दिया था l

कभी मेरी निगाहें हाथ कि घडी पर जाती तो कभी उस पेड़ कि तरफ उठती ऐसे करते-करते मैंने आधी रात बीता दिया था पर अभी तक कुछ भी घटित नहीं हुआ था l  आँखें थक चुकी थी और विश्राम पाने के लिए आँखों की पलक को लगातार झपकने लगी थी तभी अचानक मैंने देखा कि उस पेड़ से कुछ गिर रहा है l मैं सहसा उठ खड़ा हुआ और पेड़ की उस भाग की तरफ लपका जिधर कुछ गिरते हुए देखा था पर वहां फुल की कुछ पंखुडियां गिरी पड़ी थी मैं नजरे ऊपर उठाकर पेड़ की तरफ देखने लगा तब जो नजारा मैंने देखा वह मेरे दिल वो दिमाग को झंझोर कर रखा दिया l मुझे विश्वास नहीं हो रहा था की क्या ऐसा भी हो सकता है कि पेड़ से वे फल और पंखुडियां एक साथ गिर रही हो और गिरते -गिरते फल से पंखुडियां अलग हो जाती हो और और फल में अचानक पंख लग जाते हो और जमीन पर गिरने से पहले ही वह पक्षी बन कर उड़ने लग जाती हो l वह नजारा मुझे विस्मित किये जा रहा था, मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था और मैं कुछ सोचने कि कोशिश करूँ उससे पहले ही एक फल मेरे सामने गिर और वह पक्षी बन गया और मेरी तरफ झपटने  लगा उसकी लाल -लाल आँखें देखकर मैं चौंक गया और वही किया जो उस परिस्थिति में हर एक इन्सान करता डर से मैंने आँखें बंद कर ली पर डर का वह पल  मेरे धड़कनों कि रफ़्तार तेज कर दी थी जब धड़कनें सामान्य गति से चलने लगी तो मैंने देखा कि चांदनी रात अब अमावस्या कि काली रात बन गई है चारों तरफ अँधेरा ही अँधेरा नजर आ रहा था l  आँखों पर जोर दिया तो पाया कि मैं बिस्तर में लेटा हुआ हूँ l तो क्या यह एक भयानक सपना था? क्या सपने ऐसे भी हो सकते है? या फिर यह मेरे मन में छिपे किसी सोच का असर है? बचपन में हमने पढ़ा था कि एक ऐसा पेड़ भी होता है जिससे रस निकल है और मिस्र नदी में गिरकर बतख बन जाता है l तो क्या बचपन के दिनों में पढ़ी हुई घटना सपना बनकर दृश्यांकित हुआ?  या फिर यह कुछ और है? जो भी हो इस amazing tree के सपने ने मुझे रोमांचित कर दिया है l

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आपका

गोकुल कुमार पटेल

Friday, 8 March 2013

फिर से बरखा रोई

फिर से बरखा रोई


तारों भरी रात में, खामोश थी जमीं,
न जाने फिर किसके यादों में वो खोई l
दुःख था उसको प्रियत्तम का शायद,
जो फिर से बरखा रोई ll
चमक गया आँसमा भी,
आँखों से उसकी जब चमकी बिजली l
सिहर गया धरती का दिल,
दर्द से जब बरखा चींखी ll
गिरने लगे उसके आंसू जब,
धरती पर बाड़ आ गया l
सारी दुनिया चीखने चिल्लाने लगी,
जाने कैसा भौचाल आ गया ll
एक दिन से दो दिन से, तीन दिन बीत गए,
बारिश फिर भी नहीं थमीं थी l
झांक कर मैंने उसके चेहरे को देखा,
आँखों में अब भी वही नमी थी ll
सप्ताह बीत गया पर, एक पल थमी न वर्षा,
न एक पल बिजली सोई l
दुःख था उसको प्रियत्तम का शायद
जो फिर से बरखा रोई ll


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गोकुल कुमार पटेल 

Thursday, 21 February 2013

क्या फूलों का वार्षिक स्राव होता है? (गुडहल)


क्या फूलों का वार्षिक स्राव होता है? (गुडहल)


हम अगर प्रकृति की सौन्दर्य की बातें करें तो सबसे पहले हमारे आँखों के सामने जो तस्वीर उभर कर आयेगी वह कोई न कोई फुल का ही नाम ही होगा l  और होगा भी क्योकि अपवाद स्वरुप कुछ ही मनुष्यों को छोड़कर दुनिया का हर शख्स फूलों से प्यार करता है, फूलों की तरफ आकर्षित होता है तो फिर मैं इससे अछूता कैसे रह सकता हूँ l और जनाब उसी प्रेम के वशीभूत होकर मैंने घर के आँगन में फूलों की एक छोटी सी दुनिया बना ली है और उन्ही फूलों के बीच एक सुन्दर सा फुल का पौधा है, चित्र देखकर आप जान ही गए होंगे कि मैं किसके बारे में बताने जा रहा हूँ?

तो आप सोचेंगे की हाँ इसके बारे में कौन नहीं जानता ये तो गुडहल है l  बिलकुल सही दोस्तों सही पहचाना आपने ये गुडहल ही है, प्रायः यह सभी क्षेत्रों में पाए जाने वाला एक बहुवर्षीय झाड़ीदार पौधा है इसके पत्ते लम्बवत अंडाकार किनारे से धारी युक्त होते है और यह कई प्रकार के भिन्न-भिन्न रंगों पाई जाती है l  इसका उपयोग धार्मिक अनुष्ठानों में विशेष कर दुर्गा पूजन में किया जाता है  क्योकि यह धार्मिक दृष्टि से शक्ति का प्रतीकात्मक फुल होने के साथ-साथ यह आयुर्वेदिक दवाओं में भी अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है l तब भी आप कहेंगे की हाँ इतना तो हमें भी पता है इसमें और अलग क्या है?

इसके बारे में आपको एक ऐसा राज बताने जा रहा हूँ जिसको शायद कुछ ही लोग जानते होंगें या सुने होंगे l  जैसे कुछ दिन पहले तक मैंने सुन रखा था तब मुझे विश्वास नहीं हो रहा था मन में तरह-तरह के प्रश्न उठते थे कि क्या ऐसा भी होता है लेकिन कहते है न "हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े लिखे को फारसी क्या" आपको आश्चर्य होगा कि जो गुडहल का पौधा लगा है उसका फुल सफ़ेद रंग का है और हमेशा सफ़ेद रंग का ही खिलता है l सिर्फ साल में एक फुल को छोड़कर l हां दोस्तों एक साल में एक बार दीपावली के आसपास इसका एक फुल गुलाबी रंग का खिलता है l ग्रामीण क्षेत्रों में इसे फुल का वार्षिक स्राव कहा जाता है l और फुल को सहेज कर रखा जाता है विज्ञान भले ही इसको फुल का वार्षिक स्राव न माने, इसका कुछ और भी अर्थ निकाले पर यह सत्य है l क्या वास्तव में फूलों का वार्षिक स्राव होता है? आखिर इसमें कैसे एक फुल का रंग अलग हो जाता है? ऐसे ही न जाने कितने सवालों के जबाब के इंतजार में ........


आपका
गोकुल कुमार पटेल

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Thursday, 7 February 2013

सरस्वती वंदना


सरस्वती वंदना


हे ज्ञान की देवी , अज्ञान से हमको तार दे।
ख़त्म हो न ऐसा, ज्ञान का हमें भंडार दे।
हे स्वरों की देवी, हे हंसवाहिनी,
हे करुणामयी, हे वाणी दायिनी ।
हे श्वेत वस्त्रधारिणी , हे वीणा वादिनी,
गूंज उठे चारों दिशाओं में जय तेरी,
ऐसी वीणा की झंकार दे ।।
हे ज्ञान की देवी , अज्ञान से हमको तार दे ।
ख़त्म हो न ऐसा, ज्ञान का हमें भंडार दे ।।
हे शीतलता की देवी , हे ज्ञान नंदिनी ,
हे शांति की देवी , हे अशांति खंडिनी ।
हे माँ शारदे , तू है हमारी बंदिनी,
अज्ञान के अन्धकार को मिटा सके,
रोशनी ऐसी अपार दे ।।
हे ज्ञान की देवी , अज्ञान से हमको तार दे ।
ख़त्म हो न ऐसा, ज्ञान का हमें भंडार दे ।



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गोकुल कुमार पटेल

Friday, 25 January 2013

शान से तिरंगा फहरायेगा


शान से तिरंगा फहरायेगा


तुम देश के भविष्य हो, तुमको सदा आगे बढ़ना है l
छोड़ गए शहीदों ने जो काम अधुरा, पूरा उसको तुम्हे ही करना है l
राहों में कांँटे अंगारे भी होंगे, नंगे पैर हँस के तुम्हे चलना हैl
नव डगमगाए न तुम्हारी, लहरों भरी झील की l
मृगतृष्णा के मोह में न फंसना, तुममेंं शक्ति है पंचशील की l
प्रगति की मशाल अब, तुम्हारेंं ही हाथों में हैl
आंँधी से भी ज्यादा शक्ति, तुम्हारेंं ही सांसों में हैl
बदल सकते हो दुनियां को, वंशीकरण शब्द तुम्हारे बातों में हैl
इतनी शक्ति देखो तुम्हारे पास है,
फिर भी क्यों तू हताश है, निराश है l
आंँसमां भी झुक सकता है,
पृथ्वी अपनी धुरी पर रुक सकता है l
तब भी क्यों तू डरता है, ऐसा क्यों नहीं करता है l
बदल दे उस दुनिया को, जो जा रहा है पतन को ओरl
फैला दे यम की धारा, खींच ले कटी पतंग की डोर l
बुलंदी तब तुम्हारे कदम चूमेगी,
तब ही हर तरफ शकुन होगा l
खेतों में फसले लहरायेगा l
गर्व होगा देश को तुम पर,
सर उठा भारत शान से तिरंगा फहरायेगा l



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गोकुल कुमार पटेल

Saturday, 12 January 2013

सपना हैं या अनुभूति - 8


सपना हैं  या अनुभूति - 8





सुदूर पहाड़ियों के बीच घास फूस से बना एक छोटा सा आश्रम से गेरुआ वस्त्र पहने एक बौद्ध भिक्षु सा हम उम्र का एक व्यक्ति बाहर निकला l जिसको देखकर मैंने नमस्कार किया तो उन्होंने भी नमस्कार का प्रत्योत्तर में नमस्कार कर अपनी बात जारी रखते हुए कहा - गुरूजी के कृपा से मैं जानता था की आप यहाँ जरुर आओगे l

फिर तो मित्र आप ये भी जानते होंगें की हम यहाँ क्यों आये है - मैं प्रश्न वाचक दृष्टि से उन्हें देखने लगा l
अवश्य ?

            मुझे आपके आने का प्रयोजन पता है इसीलिए तो मैंने पहले से ही सारा इंतजाम कर दिया है - ऐसा कहकर उन्होंने अपने थैले में हाथ डालकर कुछ निकला और मेरी तरफ बढ़ाते हुए बोले - ये लो इसे संभाल कर रखना, पूरी जंगल खोजने पर बस इतने ही बीज मिले है l और इतने से तो आपका काम हो जायेगा l

            मैंने दोनों हाथो से स्वीकारते हुए कहा - मैं आपका यह उपकार कैसे चुकाऊंगा l

इसमें उपकार की क्या बात? ये तो गुरूजी का आदेश था, सो मैंने अपना कर्तव्य निभाया और आप भी तो गुरूजी का ही कार्य कर, अपना कर्तव्य निभा रहे है l
वो तो है - मैंने गंभीरता से हामी भरी l
अच्छा तो मुझे आज्ञा दीजिये- मैंने नमस्कार करते हुए जाने की अनुमति माँगी l ठीक है जाइये, गुरूजी का आदेश है तो फिर मैं आपको रोकूंगा भी नहीं, और हाँ जरा संभल कर जाइयेगा -  बदले में उन्होंने नमस्कार करते हुए कहा l

मैं उनसे विदा लेकर बाहर आ गया, चलो मित्रो - मैंने बाहर इंतजार करते हुए तीनो मित्रो से कहा l
जरा ठहरो, अँधेरा हो रहा है, मैं मशाल तो जला लूँ - एक मित्र ने कहा l 

और मशाल जलाकर आगे आगे चलने लगा, मैं उनके पीछे और दोनों मित्र मेरे पीछे पीछे चलने लगे l ऐसे धीरे -धीरे चलेंगे तो बहुत देर हो जाएगी - कुछ देर चलने के बाद मेरे पीछे चलने वाले मित्र ने कहा तो फिर ठीक है, सब दौड़ लगाते है - मशाल थामे हुए मित्र ने कहा l सब दौड़ लगाकर आगे बढ़ने लगे l अरे! कोई हमारा पीछा कर रहा है - चौथे (सबसे पीछे वाले) मित्र ने कहा l

कौन है? कितने है? - तीसरे(मेरे पीछे वाले) मित्र ने कहा l
अभी तो दो ही दिख रहे है - चौथे (सबसे पीछे वाले) मित्र ने कहा l
हम सब एकाएक रुक गये l
चौथे (सबसे पीछे वाले) मित्र ने कहा -अरे -अरे रुको नहीं l
आप यूँ ही आगे बढ़ते रहें  - हम उन्हें थोडा विचलित करते हैl ऐसा कहकर तीसरे (मेरे पीछे वाले) मित्र और सबसे पीछे वाले मित्र आपस में कुछ खुसर फुसर करने लगे l

मैंने पीछे मुड़कर देखा ! तो वे मुझे हाथ के इशारे से आगे बढ़ने संकेत देने लगे l मैं और मेरे मित्र ने उनके संकेत को समझ कर आगे की ओर ही दौड़ने लगे l पर हमारी नजरें रह रहकर पीछे मुड़कर उन्हें देख रही थी l वे कुछ देर के लिए वही पर रुके रहे और अचानक वे सीधी राह को छोड़ कर एक बांये तरफ और दूसरा दांये तरफ दौड़ते हुए झाड़ियों में गायब हो गए l

मन में रह-रहकर मित्रों को लेकर चिंता हो रही थी l और हम यूँ ही दौड़ते हुए जा रहे थे, कुछ समय उपरांत एकाएक सामने के झाड़ियों में से पत्तों की सरसराहट आने लगी, हमारे कान सचेत हो गए, हमारी नजरें आवाज की दिशा में घूम गई और हमारे पांव की रफ़्तार बढ़ गई, हम आवाज की दिशा से आगे निकल गए, रास्ते के दोनों तरफ से दो काली परछाई निकली और दोनों परछाई हमारी ही ओर बढ़ने लगी l हमारी रफ़्तार और तेज हो गई l

अरे ! मित्रों!  ठहरो… हम है? 
एक जानी पहचानी आवाज हमारे कानो से टकराई और हमारी रफ़्तार जिस गति से तेज हुई थी उस आवाज ने उसी गति से रुकने पर विवश कर दिया l हमने पीछे मुड़कर देखा तो पाया की वे हमारे ही मित्र है l

हम वहां पर खड़े होकर उनका इंतजार करने लगे वे धीरे-धीरे पास आते हुए, हांफते हुए हमें कहने लगे - अच्छा बेवकूफ बनाया दोनों को , ढूंढ़ रहे होंगे हमें जंगल में l लगता है आप बहुत थक गये है? कहो तो थोडा रुक कर यही पर विश्राम कर ले - उनको हांफते देखकर मैंने कहा l अरे! नहीं? धीरे -धीरे चलते है सांसे अपने आप सामान्य हो जायेंगें और कुछ ही दूर आगे तो एक गांव है वहां थोडा विश्राम कर लेंगें - उन्होंने एक साथ हमें चलने की अनुमति दे दी l

चारों एक साथ धीरे-धीरे चलने लगे, कुछ देर तक यूँ ही चलते रहे l
कुछ लोगो की आवाज आ रही है न? – चौथे (सबसे पीछे वाले) मित्र ने कहा l

लगता है गांव के नजदीक आ गये - मैंने कहा l
पर आवाज तो पीछे से आ रही है - तीसरे (मेरे पीछे वाले ) मित्र ने कहा l

हमने पीछे पलट कर देखा - पीछे चार परछाई दिखाई दे रहे थे lअरे ! दो तो वही है और दो कहाँ से आ गए -तीसरे (मेरे पीछे वाले ) मित्र ने कहा l लगता है वे पहले से ही चार थे? हम उन्हें बेवकूफ समझ रहे थे और उन्होंने हमें बेवकूफ बना दिया - चौथे (सबसे पीछे वाले ) मित्र ने कहा l हाँ? और शायद वे मशाल की रौशनी देखकर हमारे पीछे -पीछे ही आ रहे है - पहले (आगे पीछे वाले ) मित्र ने कहा l

हम धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे और वे हमारे पीछे-पीछे और हमारे करीब आ रहे थे l कि अचानक हम सब चौंक पड़े - क्योकि सामने से कुछ लोग आ गए थे l हम सब डर गए पर संयत बनाये हुए थे l और उनकी आवाज ने हमारे डर को भगा दिया l वे सब कह रहे थे - आइये -आइये हम सब आप ही का इंतजार कर रहे थे l उनके इस प्रकार के आतिथित्य सत्कार से हम सब असमंजस में पड़ गए की ये सब हमें कैसे पहचानते है हम प्रश्न  वाचक दृष्टि से उन्हें देखने लगे तो उसका भेद उन्होंने स्वयं खोल दिया कहा - घबराइए मत पहाड़ी पर जो गुरूजी रहते है  न उन्होंने दो दिन पहले ही बता दिया था की आप लोग आने वाले है l

मेरे मन में बहुत सारे प्रश्न उठने लगे की दो दिन पहले तो हमें ही ज्ञात नहीं था की हम कही आने- जाने वाले है, और इन्हें पता चल गया की हम आने वाले है l  ये शायद हमारे मित्र ने बताया होगा या ये गुरूजी का ही प्रताप होगा जो हर पल हमारी सहायता को किसी न किसी रूप में सामने आ जाते है, मैं मन ही मन गुरूजी का धन्यवाद् किया की उन्हें हमारी कितनी चिंता है और हम है की व्यर्थ ही उनके ऊपर शंका कर रहे थे l  और जब सोच टूटी तो ये क्या? हमारे साथ-साथ वे उन चारों का भी स्वागत कर रहे थे शायद गाँव वाले सोच रहे थे की वे चारों भी हमारे ही साथ है l वे चारों हमें देख-देखकर मुस्कुरा रहे थे और हम चाह कर भी उन्हें रोक नहीं पा रहे थे l उन्होंने हमें चारपाई पर बैठाया और पानी लाकर दिया l हमने प्यास बुझाने के बाद कुछ देर सुस्ताया फिर उनसे जाने की अनुमति मांगने लगे तो गांव वाले हमसे रुकने का अनुरोध करने लगे लेकिन हमारे मना करने पर वे मान गए l

हम चारों उनसे विदा लेकर चलने लगे और हमारे साथ-साथ वे चारों अजनबी भी हमारे पीछे-पीछे आने लगे l  बस अब बहुत हो चूका? पता नहीं ये क्यों हमारे पीछे पड़े है? आगे जा कर पता नहीं ये क्या करेंगें? अब तो इनका कुछ करना पड़ेगा? - मेरे दुसरे मित्र ने कहा l

आपको तो मन को विचलित करने वाली विद्या आती है न? - मेरे तीसरे मित्र के तरफ संकेत करते हुए मेरे दुसरे मित्र ने कहाl आती तो है पर उसका असर बस एक या दो मिनट के लिए ही होता है -  मेरे तीसरे मित्र  ने कहा l तब तो एक बार उसका परिक्षण कर ही लेते है सब ने हामी भरी l तो ठीक है  जैसे ही मैं मंत्र पढूंगा हम सब मौन होकर आगे की ओर दौड़ेंगे और आगे की मोड़ से पुनः पीछे की ओर दौड़ते हुए पीछे की मंदिर के आड़ में आकर छिपंगे, वे समझेंगे की हम आगे बढ़ गए है - तीसरे मित्र  ने समझते हुए कहा l

हम सब राजी हो गए और उसके निर्देशानुसार आगे दौड़ने लगे वे चारों भी हमारे पीछे-पीछे दौड़ने लगे l हम निर्देशानुसार मोड़ से पीछे की ओर दौड़ने लगे और वे आगे ही आगे दौड़ रहे थे l हम आकर मंदिर में छिप गए, वे आगे ही बढ़ते चले गए lकुछ देर तक हम यु ही मौन मंदिर के आड़ में छिपे रहे, हमारी नजर रह रह कर रास्तों पर जा रही थी l हमें जब पूरी तसल्ली हो गया की वे जा चुके है तब हम बाहर निकल आये और आगे बढ़ने लगे पर क्या देखते है की वे वापस हमारी तरफ ही आ रहे है l हमारे सारे किये कराये पर पानी फिर गया था l हम पुनः उनकी नजरो में कैद हो चुके थे, सबकी नज़रों में एक प्रश्न झलक रही थी लेकिन कोई कुछ बोल नहीं रहा था एक बार फिर हम मौन होकर आगे बढ़ रहे थे  और वे मुस्कुराते हुए हमारे पीछे-पीछे आ रहे थे l  हैरान वाली बात ये थी की अभी तक उन्होंने हमसे न तो कोई बात की थी न ही कोई चोट पहुचाई थी तो आख़िरकार उनका उद्देश्य क्या है यही सब सोचते-सोचते हम आगे बढ़ रहे थे l चलते-चलते हम एक बड़े से मैदान में पहुँच गए, तभी एक प्रकाश से सारा मैदान प्रकाशित हो उठा और उस प्रकाश के मंद पड़ते ही वहां पर एक दिव्य विमान सहित चार दिव्य युवतियों दिखाई देने लगी l हम विस्मित होकर उन्हें देखे जा रहे थे, पलट कर हमने उन चारो को देखा वे अब भी मुस्कुरा ही रहे थे l  हमें लगने लगा की कही ये चारों भी उनसे मिले हुए न हो और सब मिलकर हमें कुछ न कुछ नुकसान जरुर पहुंचाएंगे l वे चारों सुंदरियाँ हमारे पास आकर हमें अपने यौवन और सौन्दर्य से रिझाने की कोशिश करने लगीं l हम और परेशान हो गए और सोचने पर भी मजबूर हो गए की हो न हो अब हमारे सामने कोई न कोई अनहोनी होने वाली है, अनहोनी की आशंका से डर कर हमने आपस में कुछ फैसला किया और इस कार्य का भार मेरे ऊपर आ गया l

मैं युवतियों के समीप जा कर उनके सामने घुटने टेकते हुए हाथ जोड़कर उनसे याचना करने लगा, छमा मंगाते हुए मैंने उनसे कहा - हे देवीओं आप तो हमारे माँ सामान है और हम तो पहले से ही अनहोनी के आशंका से डरे हुए है इस परिस्थिति में पुत्रों के सामने माता का यह व्यवहार हमें लज्जित कर रहा है कृपया शांत हो जाये और माता की भांति पुत्रों पर आने वाली मुसीबत से हमारी रक्षा कीजिये l मेरे विनती को सुनकर वे शांत हो गए और पूछने लगे की तुम सब किस परेशानी में हो l मैंने सारा वृतांत उन्हें कह सुनाया तब उन्होंने मुझसे कहा चिंता मत करों पुत्र हम तुम्हें मन को विचलित करने वाली एक क्रिया आशीर्वाद स्वरुप प्रदान करते है l  ऐसा कहकर वे चारों उस सुन्दर विमान में जाने लगे l पर माँ मुझे तो वह क्रिया आपने बताई ही नहीं - उनको रोकते हुए मैंने कहा l  हमारे जाते ही हमारे आशीर्वाद के प्रताप से वह क्रिया तुम्हारे मन में अपने आप स्थापित हो जायेगा और तुम वहीँ करने लगोगे l 

उनके जाते ही सचमुच मैं एक क्रिया करने लगा और जब मैंने एक एक कर के चार दिया जलाई l मैंने देखा की उस दीपक के जलाते ही वे चारों घबरा गए और एक-एक करके धीरे-धीरे वे चारो गायब हो गए l 
पर यह किया? उन चारों के साथ ही साथ मेरे वे तीन मित्र भी गायब हो रहे है मैं घबरा गया और उस घबराहट ने मुझे नींद से जगा दिया l 

            मेरे मन में प्रश्नों की झड़ी लग गई की मेरा मन कहाँ चला गया था? मैं गुरूजी का कौन सा कार्य कर रहा था? मेरे साथ वे  मेरा सहयोग करने वाले तीनो साथी कौन थे? हमारे पीछा करने वाले चारों कौन थे? वे चारों युवतियां कौन थी? मैंने चार दीपक क्यों जलाये? ये चार का आकडां आख़िरकार मुझे क्या बताना चाहती है? इन्ही सवालों के जबाव के इंतजार में ..........


आपका
गोकुल कुमार पटेल

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Tuesday, 1 January 2013

स्वयं शक्ति की पुकार


स्वयं शक्ति की पुकार

                                

स्वयं शक्ति को पहचान, स्वयं शक्ति को जान l 2 l
स्वयं शक्ति को जान, स्वयं शक्ति को पहचान ll
फासले तब मिट जायेंगें, राहें आसन होंगी l 2 l
तू कदम तो बढ़ा, तू कदम तो बढ़ा ll
तू कदम तो बढ़ा, चल बिन उंगली थाम l
हौसला बुलंद कर, कर समाज का उत्थान ll2 ll
स्वयं शक्ति......................................................पहचान ll

मुठ्ठी में ही तेरे, सारी दुनिया है समाये l 2 l
क्यों ये बात तुझको, समझ न आयें ll
तू खुद विराट बन, तू खुद विराट बन l
तू खुद विराट बन, सर न झुका ll 2 ll
सर न झुका, उठ खड़ा हो सीना तान l
हौसला बुलंद कर, कर समाज का उत्थान ll
स्वयं शक्ति......................................................पहचान ll

मन में विश्वास जगा, तू ये प्रण ले l 2 l
डरेगा न तु, जीवन मरण से ll
भागेगा न तु, जीवन के रण से l
तु शस्त्र बन, तु ब्रम्हा अस्त्र बन ll2 ll
तु ब्रम्हा अस्त्र बन, झुका दे आसमान l
हौसला बुलंद कर, कर समाज का उत्थान ll
स्वयं शक्ति.................................................पहचान ll


तुझमें आत्म शक्ति है, तुझमें अटूट भक्ति हैं l
तुझमें अटूट भक्ति हैं, तुझमें आत्म शक्ति है l l
तन मन को तू साध, तू साधना कर l
क्रिया योग से, गुरु संयोग से l
हो समर्पित, तू आराधना कर l l
देवताओं को विवश कर, देवताओं को विवश कर,
देवताओं को विवश कर, करा दे अपना गुणगान l
हौसला बुलंद कर, कर समाज का उत्थान l l
स्वयं शक्ति....................................................पहचान l l



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गोकुल कुमार पटेल

Monday, 3 December 2012

सिद्धाश्रम - गुरु वाणी


गुरुदेवजी का साक्षात्कार - II

सिद्धाश्रम - गुरु वाणी

सिद्धाश्रम शब्द से ही यह बोध होता है की यह दो शब्दों के युग्मों से बना है - सिद्ध और आश्रम l सिद्ध अर्थात पूर्ण या पवित्र और आश्रम अर्थात वह स्थान जहाँ जाकर परिश्रम करने की शिक्षा प्राप्त किया जाये या परिश्रम किया जाये वह स्थान आश्रम कहलाता है l जिससे व्यक्ति के जीवन जीने की शैली का समुचित विकास होता है l हिन्दू धर्म में व्यक्ति के जीवन जीने की शैली को चार भागों में बांटा गया है l १. – ब्रम्हाचार्य, २. – गृहस्थ, ३. – वानप्रस्थ और ४. - सन्यास और इन्हें ही आश्रम की संज्ञा दी जाती है l जिनका पालन कर मनुष्य अपने पुरुषार्थ में वृद्धि करने के साथ-साथ पूर्णत्व को प्राप्त कर नर से नारायण बन सकता है l या इसे यों कह सकते है कि नर से नारायण बनने की प्रकिया का नाम ही आश्रम है l

इस प्रकार हम कह सकते है कि पूर्ण या पवित्रता को प्राप्त करने वाला वह पुन्य भूमि जहाँ जाकर परिश्रम या साधनाओं के द्वारा हम पूर्णत्व को या सिद्धित्व को प्राप्त कर सकें सिद्धाश्रम कहलाता है l सिद्ध योगियों ने काल चक्र के प्रभाव को समझा और उसके प्रभाव से मुक्त रहने व सृष्टि के सृजन करने के लिए अपने तपो बल से पृथ्वी पर ऐसे ही आश्रम का निर्माण किया है l कहा जाता है उसके सीमा क्षेत्र में प्रकृति का कोई भी नियम, कोई भी सिद्धांत लागु नहीं होता है, इंसान जन्म मरण के चक्र से ऊपर उठ जाता है और सालों या हजारों सालों तक साधनाएँ कर सकता है l वस्तुतः देखा जाये तो पृथ्वी पर स्थित उसी स्वर्ग का नाम ही सिद्धाश्रम है l

वर्त्तमान समय में उस दिव्य एवं पावन स्थलीय सिद्धाश्रम का अस्तित्व हिमालय में आज भी पूर्ण रूप से सुरक्षित है l योगी, तपस्वी  और तांत्रिक इसीलिए हिमालय में तप और साधना करने के लिए लालायित रहते है l परन्तु सदगुरुदेव की असीम अनुकम्पा, आशीर्वाद और साधना के बिना उस दिव्य एवं पावन भूमि में प्रवेश किया ही नहीं जा सकता है l इसीलिए गृहस्थ लोगों के लिए पारमेष्ठीय माता-पिता और गुरुचरणों को भी सिद्धाश्रम कहा गया है l जिनकी श्रद्धा, विश्वास और निश्वार्थ भाव से सेवा कर निश्चय ही मनुष्य जन्म-मरण के चक्र से ऊपर उठ कर मोक्ष को प्राप्त कर सकता है l


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गोकुल कुमार पटेल