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Saturday, 18 August 2012

सपना है या अनुभूति - 4


सपना है या अनुभूति - 4


गॉव में चारों तरफ बड़ी चहल पहल लग रही थी सभी लोग इधर से उधर भागे जा रहे थे मैंने एक लडके को रोक कर पूछा- क्या हुआ ? कहाँ भागे जा रहे है सब? लडके ने तत्परता से भागते हुए कहा- गॉव के बाहर जो पीपल का पेड़ है न ? वहां पर एक साधु बाबा आये हुए है बहुत पहुँचे हुए है देखते ही सब कुछ बता देते है l

जब मैंने ये सुना तो मन में कई तरह की जिज्ञासाएं उठने लगी l  और उन जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए मैं भी बाबा से मिलने पहुँच गया l  देखा चारों तरफ बहुत भीड़ है लोगों ने पुरे पीपल के पेड़ को घेर रखा है l मैं भी उसी भीड़ में शामिल हो गया और भीड़ को चीरते हुए जब पेड़ के पास पहुचां तो देखा - सफ़ेद बाल, सफ़ेद दाढ़ी युक्त सवांले से एक वयो बृद्ध छोटी से गेरुआ रंग की धोती और छोटा सा गमछा ओढ़े हुए बैठे है l  सभी उनको नतमस्तक होकर प्रणाम कर रहे थे l  उनके चहरे में गजब का आकर्षण था जिसने मुझे नतमस्तक होने पर मजबूर कर दिया l

मैंने आदर पूर्वक उन्हें प्रणाम किया तो बाबा मुस्कुराते हुए बोले - खुश रहो वत्स ! बताओं मंदिर का काम कैसा चल रहा है l मेरी नजर अगल बगल झांकने लगी की ये किसी और को तो नहीं बोल रहे है पर मेरे पास कोई नहीं थे मैंने असमंजता जताते हुए कहा - मुझे कह रहे है?

हाँ वत्स - उनके चेहरे में वही मुस्कान थी l

पर मैं तो कोई मंदिर नहीं बना रहा हूँ – मैंने उसी असमंजता से जबाब दिया l

अच्छा अच्छा तो फिर मकान बना रहे हो - बाबा ने बात बदलते हुए कहा l

मुझे उनकी बातें उलझा रही थी मैंने उलझन से निकलते हुए बोला - ये क्या? मन में जो आया वो बोले जा रहे है? मैं कोई मकान, मंदिर नहीं बना रहा हूँ?

फिर नींव किसके लिए डाली है - बाबा बोले l

वो - वो तो छोटा सा दीवाल टूट गया था उसके लिए खोदा है पर खोद तो दिया है लेकिन मेरे पास इतने ईट पत्थर नहीं है की वह दीवाल भी उठ सकें और आप मकान की बातें कर रहे है l

नींव तो डाल दी है न अब तो मंदिर बन जायेगा - बाबा ने बातों को दोहराते हुए कहा l

अब उनकी बातें मुझे गुस्सा दिला रही थी मैंने झल्लाते हुए कहा - कितने बार कहू आपसे की मैं कोई मंदिर नहीं बना रहा हूँ, मकान नहीं बना रहा हूँ l आपकी समझ में ये बात क्यो नहीं आ रही है l नींव डाल दिया बोल दिया तो बहाना मिल गया? सोच रहें होंगे की वैसे नहीं तो ऐसे तो फंसा लूँगा? और दान दक्षिणा मिल जायेगा l कुछ नहीं आता है तो बोल दो न की नहीं आता है इस तरह से पाखंड रचकर लोगों को लूटने का धंधा बना लिया है l आप जैसे लोग ही साधू, महात्मा को बदनाम कर रहे है l एक ही साँस में मैंने अपना सारा गुस्सा उन पर उतार दिया और उनको बुरा भला कहते वहां से चला आया l

कुछ ही दूर आया था की रास्ते में मुझे गुरूजी के दर्शन हो गए l मैंने गुरूजी को प्रणाम किया l मेरे चेहरे के भावों समझ गए थे शायद इसलिए आशीर्वाद देते देते मुस्कुराते हुए बोले - क्या हुआ वत्स! किस पर बिगड़ रहे हो?

वो जो पीपल के पेड़ के पास एक संत आये है न उनके ऊपर , अरे काहे का संत? बेवकूफ बना रहे है सबको, हमारे घर के  सामने का छोटा सा दीवाल टूट गया था न? उसको उठाने के लिए नींव खोदा है l कब से जैसे का जैसा पड़ा है देख लिया होगा l उसके लिए मुझे कहता है नींव डाल दिया है, मंदिर बना रहे हो की मकान बना रहे हो?

अब आप ही बताइए - कहाँ पांच फुट का दीवाल, कहाँ मकान और कहाँ मंदिर l उतने छोटे से दीवाल में मकान बनेगा की मंदिर बनेगा? 

गुरूजी मंद मंद मुस्कुराते हुये बोले -  इसमें गुस्सा करने वाली बात कहाँ है वत्स! सही तो कहा उन्होंने?

मेरा भी तो यही सवाल है वत्स! मै भी तुमसे यही पुछने वाला था कि मंदिर बनाओगें की मकान बनाओगें l

उनके बातों को सुनकर मैं अचरज में पड़ गया और मेरे चारों तरफ सन्नाटा हो गया और उस सन्नाटे ने मेरी तनिंद्रा भंग कर दी l मैंने आँखें खोल दी तो पाया की मैं पलंग पर लेटा हुआ हूँ और सचमुच सभी तरफ सन्नाटा ही सन्नाटा है पर उनकी ये बातें अब भी मेरे कानों में गूंज रही थी की मंदिर बना रहे हो की मकान बना रहे हो?

सुबह मैने सपने मे देखे हुये दिवाल का मुयैना किया किसी भी तरह से वह जगह न तो मकान बनने लायक था न ही मन्दिर बनने लायक ही था फिर बाबा ने ऎसा क्यो कहा? वो बाबा कौन थे? गुरुदेवजी ने भी ऎसा क्यो कहा? वे मुझे किन बातो का एहसास करा रहे थे? मकान व मन्दिर मे क्या अन्तर है? ये सारे सवालो के जबाब मुझे समाज के प्रति अपने कर्तब्यो का बोध कराते है, क्या ये सही है? क्या मै समाज के प्रति अपने कर्तब्यो का भलीभान्ति निर्वाहन कर पाउँगा? क्या मै समाज को एक नई दिशा दे पाउँगा? 

इन्ही प्रेरणाओ को जीवन मे उतारने की एक कोशिश में……………

            गोकुल कुमार पटेल  

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DREAM OR SENSATION - 4

Village was looking around all the hustle and bustle of people were running here and there I asked the guy to stop - what happened? Is where are you running? The shy boy promptly said - Village People outside of the tree is not it? There has been a lot of sage has reached the view that everything is just.
When I heard that many of the queries raised in the mind,
And to defuse the queries I got to meet Baba l saw a crowd of people around the trees, laid siege to the entire People.
White hair, white beard, an elderly Swanle containing small orange-colored dhoti and a small sitting wrapped in bandannas. They bow their heads bowed and their faces were all the wonderful things that I was forced to bow their heads.
I humbly bowed to the sage said, smiling - happy Watts! Tell me how is the work of the temple began to look around you to see if they are not talking to anyone else but I have none expressed dilemma said - I are saying is
Yes Watts - his face was the same smile .
But I am not making a temple - I answered the same dilemma.
So the houses are well built - Baba's changing the.
I was confused and out of the things I said was confusing - what is this? Came to mind that they are talking? I have no house, the temple is not?
For whom the foundation is laid - Baba said,
She - she dug for him a small wall was broken
You have to dig, but I've got to get up and eat the stone wall of the house are the things that you.
So do not put the foundation will now become the temple - Baba reiterated the points.
Now the things I was aggravating, Rattling I said - how many times you say I'm not a temple,
  I am not making house, You can not understand why it's. Have laid the foundation said it was the excuse? Will be thinking of the way so that you'll get caught? will give alms and donations.
If something does not speak or do not, The hypocrisy of the arguments people have made the business of rob. People like you saints, are infamous for Mahatma.In the same breath I take your anger on them and abuse them came from the.
Some came away in the way that I have visions of master. I bowed to the Guru, My facial expressions were understood. Maybe give the blessing with a smile and said - what Watts! What are the worse?
People who are not their top of the tree came a saint, a saint oh why? Making a fool of everyone, a small wall in front of our house was broken right? He dug the foundation for taking such a long. l like to have seen tells me it has laid the foundation, the temple are made ​​of the houses are built?
Now you tell me - where five feet of the wall, where many small houses and where the temple. temple wall of the house will be?
Dim-dim priest said while smiling - that's where the anger Watts! Right then did he say?
Watts I also have the same question! I was you, the inquiry, the temple houses Bnaogen Bnaogen.
Listening to the things I had to wonder and silence was all around me, The silence broke my Tnindra.  Opened my eyes when I found I was lying on the bed and indeed all the silence is the silence
These things, he was still buzzing in my ears are the temple of the houses are built?
I had seen in dreams Muyana day to be pointing in any way to the house was worth neither the place nor the Baba temple was worthy of being called so, why? Those who were Baba? It also said Gurudevji Why? What are the things I felt they were? What is the difference between house and temple? I answer all these questions is to make society aware of his obligation, is that right? Of their obligation to society what I'd been handling well? What I'd give the society a new direction? In an attempt to bring these inspirations in life ...............

Gokul Kumar Patel

Wednesday, 11 July 2012

A Farmer (किसान)


किसान

एक किसान बडा परेशान l
सुखे-सुखे से खेत थे सारे,
सुखा-सुखा सा था,
सारा खलिहान l l
खेत के मेढ़ पर बैठा,
कभी-कभी सुखे पसीना पोंछता है l
फुरसत के कुछ क्षणों में,
कभी-कभी वो भी सोचता है l l
सारा खेत अगर,
हरा-भरा होता  l
बच्चो की पढाई होती,
काली कुतिया भी चुपचाप सोता l l
हर मांगे पुरी होती,
हो जाती धुमधाम से,
बच्चो की शादी l
नाती-पोते गोद में आते,
क्या होता?
जो बढ़ जाती थोडी सी आबादी l l
सब कुछ पर है,
अब एक सपना l
नसीब में लिखा है शायद,
पानी-पानी जपना l l
पथराई निगाह से,
आसमान को निहारता l
बारिश के लिये,
हर पल गुहारता l l
आँसू सुख गये थे,
आँखों से अब,
निकल रहा था खुन l
करुण ह्र्दय से कह रहा था,
ऊपर वाले अब तो सुन l l
पर वही चिलचिलाती गर्मी थी,
आसमाँ एकदम साफ था l
मौन थी सरकार जैसी,
ईश्वर भी,
वैसा ही चुपचाप था l l
बद से बदतर,
अब हालत उसकी हो गई l
पीछे मुडकर उसने देखा,
गायब थी उसकी परछाई l l
देखकर तकलीफ उसकी,
आसमान को,
आ गई रुलाई l
पानी के जगह उसने,
एक बूंद अमृ्त गिराई l l
बदकिस्मत था किसान,
जो खुशी,
बीच रास्ते में छीन गया l
अमृ्त की उस बुन्द को,
चातक पी गया l l
बारिश के आस में,
किसान अब भी जी रहा है l
फर्क बस इतना है,
चातक की जगह,
उन बूंदों को नेता पी रहा है l l


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A Farmer


So worried a farmer
dried dried were all the farm.
which was dried dried
all the grainery.
sits on the boundary of farm,
Occasionally wipe dried sweat
In a few moments of leisure,
Occasionally thinks he
If the whole farm,
Green - filled
educated of all the children
silently sleeps the black bitch
completed of all the required 
by magnificence
marriage of the Children
Grand-children come to adopt,
What?           
population which increases slightly
Everything is on
longer a dream
Fate is, perhaps,
Chanting is water-water
Watched on,
Staring at the sky
For rain,
To pray every moment
have dried the tears,
Eyes now,
was leaving blood
saying was to mercy heart,
god, hear it now
But the scorching heat,
clear of the sky
Was silent as the government,
God,
Quietly so that
From bad to worse;
His condition is now
Turn around and he saw;
missing was his reflection
Seeing her pain,
The sky,
Came crying
Place it in water,
fall a drop the nectar
Was unlucky farmers,
The joy,
was away in the middle of the road
drop the nectar,
the partridge was drunk
In the vicinity of the rain,
Farmers are now living
The only difference is
replace the partridge
drink is a leader who drops

(I am waiting for your reaction )

Tuesday, 10 July 2012

सपना है या अनुभूति -3


सपना है या अनुभूति -3



               कुछ ही दिन हुए थे मुझे गुरूजी से जुड़े हुए, मैं ज्यादातर समय उन्हीं के पास इधर-उधर घूमता रहता था l मैं बिना किसी रोक टोक के बेधड़क, बेहिचक कभी भी हर छोटी-बड़ी तकलीफों, कष्टों के लिए सीधे गुरूजी के पास चला जाता था l बाकि सारे गुरु भाई (शिष्य) उनसे इस तरह से नहीं मिल पाते थे मुझे अपने आप पर गर्व था, की मैं उनका सबसे  ज्यादा चहेता शिष्य बन गया हूँ l

ऐसे ही एक दिन जब मुझे एक छोटी सी कष्ट सताने लगा और कष्ट तो कष्ट होता है इसमे छोटी क्या और बड़ी क्या, मैं आदतन उस कष्ट के निवारण के लिए सुबह-सुबह ही सीधा गुरूजी के पास पहुँच गया l उस दिन मुझे गुरूजी के दर्शन के पहले ही गुरुमाता के दर्शन हो गए, देखा गुरुमाता आज थोड़ी गुस्से में लग रही थी l मेरा अनुमान सही निकला मुझे देखते ही झल्लाए सी बोली - आ गए ? मैंने हाँ कहकर अभिवादन किया पर उन्होंने मेरे अभिवादन को अनसुना करते हुए उसी स्वर में बोली - आज फिर कोई परेशानी आ गई होगी ? आज फिर कोई कष्टों ने घेर लिया होगा? मैं निरुत्तर बौखलाए मौन खड़ा था क्योकि गुरु माता की वाणी में जो कठोरता थी वह मुझे असमंजस में डाल रही थी आज मैं गुरुमाता के जिस रूप का प्रतिकार कर रहा था उसकी मैंने सपने में भी कल्पना नहीं की थी मुझे कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था की आज गुरु माता को क्या हो गया? आज गुरुमाता मुझसे गुस्से में बातें क्यों कर रही है मुझे क्यों डांट रही है ? फटकार क्यों रही है ?

गुरु माता मुझे प्रश्नवाचक दृष्टि से देख रही थी और वाणी में वही कठोरता लिए बोले जा रही थी - जब भी कोई समस्या आती है सीधे यहाँ चले आते हो? गुरूजी कब क्या करते है जैसे इसका तुम्हें पता ही नहीं? तुम्हे लगता होगा की गुरूजी सिर्फ तुम्हारे लिए ही यहाँ बैठे है? अरे हाँ - तुम तो उनके चहेते शिष्य हो यहाँ कभी भी आ- जा सकते हो है न? मैं पूछती हूँ जब तुम इतने ही गुरूजी के प्रिय शिष्य हो तो क्यों हर समस्यों के लिए तुम्हे यहाँ आना ही पड़ता है ? क्यों हर समस्या गुरूजी को बतानी पड़ती है ? क्यों तुम्हारी आवाज गुरूजी के पास नहीं पहुचती ? क्यों तुम्हारी पीड़ा, तुम्हारे कष्ट का गुरूजी को एहसास नहीं होता? क्यों तुम्हारा मन गुरूजी के अंतर्मन से जुड़ नहीं पा रहा है?

गुरुमाता लगातार प्रश्न पर प्रश्न किये जा रही थी और उनकी एक-एक बाते एक-एक प्रश्न मेरे कलेजे को तार तार कर रही थी  मैं इस पीड़ा को सहन नहीं कर पा रहा था दुःख से मेरे आंसू गिरने लग गए थे यह दुःख इस बात का नहीं था की गुरु माता मुझे डांट रही है फटकार रही , अरे - कहते है न माता की हर डांट फटकार बच्चे को गुमराह होने से बचाती है, नई सीख देती है, सही मार्ग दर्शन करती है , फिर उनकी बातें मुझे पीड़ा कैसे देती? कैसे मैं उनसे रुष्ट हो सकता था, यह दुःख यह वेदना तो आत्मबोध का था, जो आज मुझे गुरु माता करा रही थी जिस मार्ग से मैं भटक जा रहा था उसका सही मार्गदर्शन करा रही थी आज मैं जान पाया था की मैं गुरूजी से कितना दूर हूँ? गुरु को कितना आत्मसात कर पाया हूँ? सही मायने में गुरु शिष्य के सम्बन्ध को आज पहचान पाया था?  आज मुझे पता चला की मेरी साधनाएँ कितनी अधूरी है और उनके जोर पर मैं इतना उछल रहा था मेरी चाटूरकता मेरे घमंड ने मुझे आगे कर दिया था l इसका एहसास आज मुझे हो रहा था की शिष्य के उस कतार की बातें कर रहा था उसमें मेरा स्थान तो था ही नहीं, मेरे मन में जो अहम्, जो घमंड पनपने लग गए थे उनका अंत हो गया था मैं उस दुःख के बोझ से दबा जा रहा था और अंततः उस बोझ को मैं सहन नहीं कर पाया मेरे पैर लड़खड़ाने लगे और मैं दुःख से वही पर निढाल हो गयाl

सुबह जब आँखे खुली तो मेरा मन प्रफुल्लित था की सही मायने में मैं उनका शिष्य हूँ तभी तो उन्होंने मुझे आत्मबोध कराया l मेरा चेहरा चमक रहा था की मेरे साधनाओं को सही मार्गदर्शन तो मिल रहा है, मैं कृतार्थ हो गया की आज मैंने सपने में ही सही गुरु माता के दर्शन तो किये l ये गुरुदेवजी की महिमा ही तो थी की उन्होंने इस तुक्ष बालक का ख्याल रखा और मन में पनपने वाली विकारों का नाश किया l मैं उस सदगुरुदेवजी को कोटि कोटि प्रणाम करता हूँ l

उस ब्रम्ह स्वरुप गुरुदेवजी के अंतर्मन से मन की तार जोड़ने की कोशिश में ...................


आपका अपना 

गोकुल कुमार पटेल





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Saturday, 23 June 2012

कलश पूजा


कलश पूजा


              पूजा से धर्म और सांस्कृतिक का बचाव नहीं होता अपितु पूजा से समृद्धि, के साथ साथ सात्विक विचारों की अभिब्यक्ति भी होती है l हिन्दू धार्मिक अनुष्ठानों में पूजा करने के लिए भिन्न भिन्न प्रकार के देवी देवताओं को स्थापित कर उनकी पूजा की जाती है l और उन्ही में से एक है कलश स्थापना और कलश पूजा करना l कलश को हम घड़ा, मटका, सुराही आदि नामों से जानते है l कलश को वैसे तो लक्ष्मी का रूप मानते है पर इसकी स्थापना एवं पूजा करने से सिर्फ लक्ष्मी की ही नहीं वल्कि आकाश, जल, थल एवं समस्त ब्रम्हांड की भी पूजा हो जाती है l जिससे हमारे विभिन्न प्रकार के दोषों का निवारण अपने आप ही हो जाता है और सौभाग्य एवं ऐश्वर्य में वृद्धि होने लगती है इसलिए घर में कलश की स्थापना करनी ही चाहिए l
कलश स्थापना की विधि:-
v  कलश स्थापना के लिए तांबा व पीतल के कलश का इस्तेमाल भी कर सकते है पर कलश पृथ्वी का प्रतिक होने के कारण लालिमा आभा लिए मिट्टी का कलश अधिक उपयुक्त है l कलश काला या दागदार नहीं होने चाहिएl

v  कलश की स्थापना किसी भी धार्मिक अनुष्टान के समय, पूर्णिमा, अमावस्या या किसी भी शुभ तिथि में की जा सकती है l

v  कलश स्थापना करने के लिए सर्व प्रथम कलश को स्वक्छ जल से अच्छी तरह धोकर पोछ लेवें l

v  कलश को वस्त्र पहनने के लिए कलश के गले में मौली (रक्षासूत्र ) को तीन बार लपेटना चाहिए l

v  सत्य का सतत विकास की ओर अग्रसर होने के लिए प्रेरित करने वाला सतिया (स्वास्तिक ) का निशान कलश के मध्य में रक्त चन्दन या सिंदूर से बनाने चाहिए l

v  उत्तर- पूर्व दिशा (ईशान कोण) में लक्ष्मी, कुबेर और जीवनदायनी जल का स्थान होने के कारण कलश की स्थापना पूजा घर के ईशान कोण में करनी चाहिए l

v  लकड़ी के बजोट या आसन पर सफ़ेद कपड़ा बिछाकर चावल या रंगोली से नौ ग्रह का प्रतीकात्मक अष्टदल बनाकर कलश को उसके ऊपर स्थापित करनी चाहिए l

v  कलश में गंगाजल, विभिन्न तीर्थ स्थलों के नदियों का जल या स्वक्छ जल भरना चाहिए l

v  कलश के अन्दर सर्वोषधि (दूब, वच, कुश, हल्दी, तुलसी आदि), पंचरत्न (सोना, चांदी, तांबा, पीतल, लोहा ), गोल सुपारी, चावल के कुछ दाने, मधु, इत्र, सिंदूर, तांबे का सिक्का या कोई भी एक या दो रुपये का सिक्का डालने चाहिए l

v  कलश के मुहं में समस्त शोक एवं दोषों के निवारण और दसों दिशाओं को इंगित करने के लिए अशोक या आम का दस पत्ता लगाना चाहिए l

v  कलश का कटोरीनुमा ढक्कन जिसे पूर्णपात्र कहा जाता है, पूर्णपात्र में लक्ष्मी स्वरुपणी धान डालकर कलश के मुंह को ढक देना चाहिए l

v  नारियल में लाल कपडे या मौली (रक्षासूत्र ) का धागा लपेट कर उसके ऊपर स्थापित करना चाहिए l ध्यान रहे नारियल का नोकीला भाग आकाश तत्व को इंगित करता है इसलिए नोकीला भाग सदैव ऊपर होने चाहिए l

v  तत्पश्चात धुप, दीप, फुल एवं मंत्रोपचार द्वारा विधि पूर्वक कलश का पूजन करना चाहिए l     
 
v  कलश के पानी को कभी सूखने न दे, हो सके तो हर पूर्णिमा या किसी भी शुभ तिथि में कलश में दोबारा विधिवत पानी भरने चाहिए l


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कली











कली

ऐ कली ठहर जरा, 
अभी सबेरा हुआ नहीं,
आंसमा की चादर ओढ़े सूरज सो रहा है,
भोर गीत गाकर,
किसी ने अब तक उसे जगाया नहीं l ऐ कली ……
अँधेरा भी जग रहा है, 
चाँद तारे भी जग रहे है,
झींगुर भी सिटी बजाकर रखवाली तेरी कर रहा है,
जग रहा है उल्लू अभी, 
जम्हाई उसे भी आया नहीं l ऐ कली ……
प्रहर करवट बदल रहा है, 
ब्रहम मुहूर्त अभी आया नहीं,
पक्षियों ने अभी चहचहया नहीं, 
पंख अपना फडफडया नहीं,
खिल गया अगर तू अभी, 
पंखुड़ी तेरे झुलस जायेगें
शीतल, मधुर, ठंडी पवन,
पूरब ने अभी बहाया नहीं l ऐ कली ……
बिखर जायेगें फिर खुशबू तेरे,
तितली भी पास नहीं आयेगा, 
भौंरा मौन हो जायेगा,
मधुर गीत फिर कोई गुनगुनाएगा नहीं l ऐ कली ……


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BUD

Hey, wait a minute bud,
Not yet dawn,
Linen cloth of the sky the sun is sleeping,
Dawn singing,
Not yet woken up to a
Hey, wait a minute bud,
Not yet dawn,

The world is dark;
Stars are the moon is awakened,
Protect the whistle for your beetle is
Owl is still awake,
He was not yawning
Hey, wait a minute bud,
Not yet dawn,

time side changing
dawn moment was still not
twitter not just birds,
Feather your Wings spread not
If you still were blooming;
You will be leaving scorched petals
Soft, sweet, cold wind,
East had not yet shed
Hey, wait a minute bud,
Not yet dawn,

Scatter the fragrance, you will be leaving,
Butterfly will not get too close;
Bumblebee will be silent;
No one will sing the sweetest song
Hey, wait a minute bud,
Not yet dawn,

(These guides can be composition your response to me, i am waiting for your response )


Friday, 8 June 2012

एक कोशिश तो कर के देखो

 एक कोशिश तो कर के देखो




जीते है सब ही अपने लिए ,
कभी दूसरो के लिए जी के देखो l
मरते है सब अपनी ही मौत ,
कभी दूसरो के लिए मर के देखो l
आसान तो नहीं है कहना और करना l
पर बस एक कोशिश तो कर के देखो ll
भ्रष्टाचार  से समाज त्रस्त है l
अफसर हो या नेता सभी भ्रष्ट है l
पर गौर से देखो हम ही तो,
भ्रष्टाचार  से पस्त है l
सुधारो पहले अपने आपको,
एक तमाचा तबियत से,
अपने गालों पर जड़ के देखो l
आसान तो नहीं है कहना और करना l
पर बस एक कोशिश तो कर के देखो ll
क्यों हम इतने बेबस और लाचार है ,
क्यों हर तरफ रिश्वत और कालाबाजार है l
सोचो कभी हमने किसी को रोका है ,
सोचो कभी हमने किसी को टोका है l
मौन न बैठो, अब तो हौसला बुलंद करो,
बस ये काम चंद करो,
जगाओ अपने ही जमीर को l
बेबस सा रोना धोना बंद करो l
आसान तो नहीं है कहना और करना l
पर बस एक कोशिश तो कर के देखो ll
जीवन तब सुधर जायेगा,
उम्र भी आसानी से गुजर जायेगा l
कभी फिर न तू अकेला होगा,
हर तरफ खुशियों का मेला होगा l
रौशन हो जायेगा घर आँगन,
मुट्ठी में तारों को भर के तो देखो l
आसान तो नहीं है कहना और करना l
पर बस एक कोशिश तो कर के देखो ll


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Friday, 1 June 2012

सपना है या अनुभूति – 2


सपना है या अनुभूति – 2

          मैं सदगुरुदेवजी  के चरणों में नतमस्तक हुए बैठा था गुरुदेव मुझे आध्यात्मिक शक्तियों के बारे में बता रहे थे जिनको प्राप्त कर  मनुष्य की जीवन शैली में परिवर्तन लाकर अपने समस्याओं और कष्टों का निवारण भी कर सकता था l वे मुझे एक एक करके गुण रहस्यों के बारे में बता रहे थे, और मैं मंत्र मुग्ध सा उनके मुख मंडल को निहारे जा रहा था, मैं मन ही मन सोच रहा था की गुरुदेव मेरे इतने समीप थे और मैं बेकार ही उनको यत्र-तत्र ढूंढ़ रहा था l मैं भाव विभोर हो उठा - और आखिरकार मेरे मन की बातों को मेरे आँखों ने छलक कर गुरूजी  को कह ही दिया , मेरे गालों पर लुढ़कते आसुओं को देखकर गुरूजी ने मुझसे पूछा क्या हुआ बेटा? तुम्हारे आँखों में आसूं ? उनके इतना कहते ही मैं मन की पीड़ा को रोक न सका, मेरे आँखों में आसुओं का सैलाब सा उमड़ पड़ा, मेरा गला भर आया और मैं फुट फुटकर रोने लगा l

            गुरूजी ने मेरी पीठ थपथपाते हुए ढीढस बंधाते हुए मेरे रोने का कारण पूछने लगे, मैंने आसूं पोछते हुए रुआँसे होकर उनके चहरे को देखते हुए कहा- आप इतने दिन तक कहाँ थे, उनके चहरे पर मंद मंद मुस्कान तैर गई, और मुस्कुराते हुए बोले - मैं तो हर क्षण तेरे पास ही था, तेरे मन में था और तेरे हर दुःख से हर विपत्तियों में बचाकर तुझे सच्ची रह दिखा रहा था, वह मैं ही तो था,  पर तू ही मुझे पहचान नहीं पाया?  पर ये कैसे हो सकता है की आप मेरे साथ हो और मैं आपको पहचान नहीं पाऊ- मैंने असमंसस स्वर से उनको पूछा? बड़े ही सयंत स्वर में उन्होंने जबाब दिया - ये तेरे कुछ पुनर्जन्म के और कुछ इस जन्म के दोष थे जिसके कारण मैं तेरे इतने पास होते हुए भी तू मुझे पहचान नहीं पा रहा था, मैं आत्मा ग्लानी से भर गया आंसुओं की धारा तीव्र हो गई l तब, गुरुदेव ने मेरे आसुं पोछते हुए कहा - अब रोना छोड़? देख तेरे दोष तेरे इन आंसुओं से धुल गए है और तेरे लिए ही तो मैं यहाँ  आया हूँ तेरे अटूट प्यार श्रद्धा और विश्वास ने मुझे तुझसे साक्षात्कार करने पर मजबूर कर ही दिया l मैंने अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा - मुझसे दूर तो नहीं होंगे? गुरुदेव बोले बेटा हर पल ही तो मैं तेरे साथ हूँ जब जब तू याद करेगा मुझे साथ ही पायेगा l

             मैं सदगुरुदेवजी  के चरणों में नतमस्तक हो कर प्रणाम किया , और जैसे ही मैंने नजरें उठाई देखा गुरूजी के चेहरे पर वही मुस्कान थी वे मंद मंद मुस्कुरा रहे थे और उनकी छवि धीरे धीरे धुंधली होती जा रही थी, मैं सहसा उठ बैठा और देखा की गुरुदेव मेरे कमरे के दरवाजे में पूर्ण रूप से समाहित हो गए थे मैंने उनको पुनः सर झुका कर प्रणाम किया l
             
             मैंने घडी पर नजर दौड़ाई देखा रात के २:५६ मिनट हुए है मैं बिस्तर पर लेट गया,  और एक बार फिर मेरे आँखों में आसूं की धारा उमड़ पड़ी लेकिन ये आसूं सदगुरुदेव से विछुड़ने का नहीं था ये आसूं तो मुझे बोध करा रहे थे, एहसास दिला रहे थे मेरे दोषों का क्योकि अभी तो उनका साक्षात्कार सिर्फ सपने में हुआ है, पता नहीं कब मेरे दोषों का अंत होगा या होगा भी या नहीं? मेरी साधना मेरी पुकार उनको बुला सकती है या नहीं?  मैं कभी उनका साक्षात्कार कर पाउँगा भी या नहीं? ऐसे बहुत सारे सवाल मेरे मस्तिक में कौंध रहे है l

           अक्सर ये सवाल मेरे जहन में हिलोरे लेती रहती है , और विरह की यह वेदना आँखों से छलक जाया करती है l

सदगुरुदेव से मिलने की आस में ............



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