Friday, 16 June 2017

एक अबोध बच्चा



एक अबोध बच्चा
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एक अबोध बच्चा, मन का कच्चा।
कैसे सीख लेता है,  खाना, पीना, सोना।
लोग कहते है प्रकृति है,
मुझे लगता है तृप्ति है।
प्यास और भूख का, शरीर के सुख का।

एक अबोध बच्चा, मन का कच्चा।
कैसे सीख लेता है, रोना, धोना, हंसना।
लोग कहते है प्रकृति है,
मुझे लगता है वृत्ति है।
मन के व्याकुलता का, हृदय के अनुकूलता का।

एक अबोध बच्चा, मन का कच्चा।
कैसे सीख लेता है, उठना, बैठना, चलना।
लोग कहते है प्रकृति है,
मुझे लगता है प्रवृत्ति है।
मनुष्य समाज का, समाज के विकास का।

एक अबोध बच्चा, मन का कच्चा।
कैसे सीख लेता है, खेलना, कूदना, दौडना।
लोग कहते है प्रकृति है,
मुझे लगता है वृद्धि है।
दिल के उमंग का, शरीर के हर अंग का।

एक अबोध बच्चा, मन का कच्चा।
कैसे सीख लेता है, तोडना, फोडना, जोडना।
लोग कहते है प्रकृति है,
मुझे लगता है कृति  है।
व्याग्रता, द्वेष, क्रोध का, विकारों के विरोध का।

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गोकुल कुमार पटेल


(इन रचनाओ पर आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए मार्गदर्शक बन सकती है, आप की प्रतिक्रिया के इंतजार में )



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