Saturday, 17 November 2012

विदाई


विदाई
हे बंधू आपने जिस प्यार से,
इस मंदिर को सजाया है l
करके सुआचरणों का पालन,
गुरुजनों का बढाया है l l
हम भी उसी प्यार के रंगों से,
इस मंदिर को रंगायेंगे l
सदाचार का करके पालन,
गुरुजनों का मान बढ़ाएंगे l l
सदा अच्छे बनाने के लिए,
अनुशासन को आपने स्वीकार किया l
भेदभाव न माना कभी आपने,
छोटों बड़ों को प्यार किया l l
हम भी सदा उसी अनुशासन को अपनाएंगे l
भेदभाव को मिटाकर,
हम भी प्यार का दीप जलाएंगे l l
गुरु तो गुरु है ही,
पर आपने भी गुरु का काम किया l
लाकर अच्छे अंक आपने,
स्कुल और गुरुजनों का नाम किया l l
अनुज है हम तुम्हारे,
तुम्हारे पथ पर चलते जायेंगे l
लाकर अच्छे अंक हम भी,
स्कुल और गुरुजनों का कीर्ति बढ़ाएंगे l l
सखा मिले आप सा इसका हमें पता नहीं l
पढाई करनी है आगे आपको,
इसमें आपकी कोई खता नहीं l l
आगे की पढाई हमको आपसे जुदा करते है l
नमन कर शुभकामनाओं के साथ,
हम भी आपको विदा करते है l l



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Wednesday, 7 November 2012

सपना है या अनुभूति -7


सपना है या अनुभूति -7


वत्स - उठो.. .?

आँखें खोलो? कब तक सोये रहोगे? देखो मैं आ गया हूँ ? एक चिर परिचित आवाज ने मेरी आँखें खोल दी, देखा एक सुन्दर कमल के आसन पर गेरुआ वस्त्र से सुशोभित, हाथ और गले में रुद्राक्ष की माला पहने, अखंड सूर्य से प्रकाशित आभा और त्रिलोक को वश में करने वाली मंद मंद मुस्कान लिए सदगुरुदेवजी मेरे समीप दिखाई दिए l

मैं उठा और बिस्तर पर बैठे-बैठे ही उनको प्रणाम किया, मुझे स्मरण हो आया की मेरे पुत्री का जन्म हुआ तब सभी की भांति मैंने भी जन्मोत्सव का पहला आमंत्रण पत्र ईश्वर के चरणों में समर्पित किया और अपने पुत्री के उज्जवल भविष्य के लिए उनसे आशीर्वाद देने का आग्रह किया l  

सदगुरुदेव जी बोल रहे थे वत्स तुमने  पहला आमंत्रण पत्र मुझे दिया था देखो सबसे पहले मैं ही आया हूँ l मुझे अपने आँखों पर अपने आप पर विश्वास नहीं हो रहा था की उन्होंने मेरा आमंत्रण स्वीकार ही नहीं किया अपितु वे आशीर्वाद देने मेरे घर भी आये है l मैं आवक सा मंत्रमुग्ध और इतना भाव विभोर हो गया की भावुकता वश मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था और आँखों से ख़ुशी के आंसू थे की मेरे चाहने पर भी थम नहीं रहे थे l  मैं असमंजस में पड़ गया की गुरूजी का कैसे आदर सत्कार कैसे करूँ, उनका आभार व्यक्त कैसे करूँ l 

शायद सदगुरुदेव मेरे मनः स्थिति को भाँप गए l

उन्होंने मुझसे पूछा - वत्स ! पुत्री को मेरे गोद में दो? मुझे भी तो दुलार करने  दो?

मैं पलंग की तरफ देखने लगा लेकिन पलंग में मेरे और मेरे पत्नी के अलावा कोई नहीं था l मैं दुविधा में पड़ गया और इधर उधर देखने लगा, अरे - बच्ची कहाँ गई? मैंने पलंग के नीचे भी ढूंढा पर बच्ची नहीं मिली, कहीं भी बच्ची को  नहीं पाकर मैंने गुरूजी के तरफ नजरे घुमाई l 

पर ये क्या?

गुरूजी भी वहां नहीं थे, वे भी अंतर्ध्यान हो गए थे l सिर्फ अँधेरा ही अँधेरा नजर आ रहा था मैंने आँखों पर थोडा सा जोर लगाया और हाथ बढाकर बिजली का बटन दबाया l बल्ब की रोशनी से पूरा कमरा रौशन हो गया तब मैंने देखा की  की पलंग में मेरी गर्भवती पत्नी गहरी नींद में सोई है l 

तो क्या मैं जो देख रहा था वो एक सपना था?

फिर वो गुरूजी कौन थे? जिन्होंने मुझे उठाया और वत्स कहकर पुकारा? उन्होंने मुझसे क्यों कहा की पुत्री कहाँ है? क्या गर्भ में जो बच्चा है वह पुत्री है?  क्या ये मेरे पुत्री होने की भविष्यवाणी है? या क्या यह सिर्फ एक सपना था या मेरे मन की अनुभूति है? जो मुझे रात के सन्नाटे में सुनाई दिया?

ऐसे ही कितने सवालो का जवाब पाने के इंतजार में........



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Saturday, 3 November 2012

भाग्य


भाग्य

भाग्य को किस्मत, तक़दीर, मुक्कदर, नसीब आदि नामों से जानते है और अक्सर लोगों को कहते भी सुना है की उसके भाग्य में लिखा था इसलिए उसे मिला?, तुम्हारें भाग्य में नहीं लिखा है तो तुम्हें नहीं मिलेगा?, तुम्हारें भाग्य में जो लिखा है वही होगा?, तुम्हारें भाग्य में जितना लिखा होगा वही तुम्हें मिलेगा?, भाग्य से अधिक तुम्हें कुछ नहीं मिल सकता?, भाग्य से कोई लड़ नहीं सकता?,  भाग्य से लड़ना हमारें बस की बात नहीं है?, भाग्य कोई बदल नहीं सकता है ? इस प्रकार भाग्य के बारे में तरह-तरह के लोगों से तरह-तरह की बातें सुनने को मिलती है l

पर कभी आपने सोचा है की - 

आख़िरकार ये भाग्य है क्या ? जिससे अधिक हमें कुछ क्यों नहीं मिल सकता ? हमें जो मिलना है उसका निर्धारण पहले से कैसे कर लेता है? यह कैसे किसी के साथ जुड़ जाता है? यह कैसे बनता है ? क्या इसे बदला जा सकता है? हम कैसे इसे बदल सकते है? या फिर यह बदला ही नहीं जा सकता है ? क्यों यह बदला नहीं जा सकता है? इस तरह के न जाने कितने सवाल हमारें दिमाग में उठते है और हम भाग्य को जानने के लिए, भाग्य को बदलने के लिए मंदिरों में, दरगाहों में घुमते रहते है कभी-कभी पाखंडी बाबाओं के चक्कर में फंस कर अपना सब कुछ भी गवां बैठते है l और भाग्य की बिडम्बना तो देखो ईश्वर तो ईश्वर, अगर सदगुरुदेव सामने भी आ जाते है तो भी हम उन्हें पहचान नहीं पाते है और बिना किसी समाधान के निराश, निरुत्तर मौन होकर अपने भाग्य को कोसते रहते है l 

            ज्योतिष शास्त्र की माने तो भाग्य पूर्व जन्म का फल है, पूर्व जन्म में हमने जैसे-जैसे कर्म किये है उसी के अनुसार हमें फल मिलता है l इसको हम इस तरह से समझ सकते है मनुष्य का कर्म अर्थात मनुष्य का वर्तमानकाल जब व्यतीत होता है तो वह भुतकाल बन जाता है और उसी भूतकाल से भविष्यकाल का निर्धारण होता है l पूरी सृष्टि जैसे एक चक्र पूरा करता है उसी तरह मनुष्य का भाग्य चक्र भी वर्तमान काल से भुतकाल, भुतकाल से भविष्यकाल और भविष्यकाल से वर्तमानकाल तक घूमता रहता है l जब तक मनुष्य मोक्ष को प्राप्त नहीं कर लेता है, तब तक यह भाग्य चक्र निरंतर चलता रहता है, चलता रहता है l

इसका मतलब तो यह हुआ की कर्म प्रधान होता है l और कर्म से भाग्य बनता है, तब मन में प्रश्न यह उठता है की फिर एक बच्चा कैसे अमीर घर में जन्म लेता है तो एक बच्चा गरीब घर में जन्म लेता है, कोई अपंग होता है तो कोई जन्म लेते ही काल का ग्रास भी हो जाता है l और तो और बच्चा कैसे गर्भ में ही दम तोड़ देता है उन्होंने तो कोई कर्म किया ही नहीं होता है, तब किस आंकलन से निर्बोध बालक का भाग्य तय होता है फिर कैसे हम माने की कर्म से भाग्य का निर्माण होता है l

ये सच है की भाग्य के निर्माण में कर्म की भूमिका अहम् होती है पर केवल कर्म से ही भाग्य का निर्माण नहीं होता है वरन किसी भी भाग्य के निर्माण में उसके उसके माता-पिता और पूर्वजों के कर्मों का भार जुड़ने के साथ-साथ ही जनम लेते समय जिस वातावरण अर्थात उस समय की ग्रहों और नक्षत्रों की चाल से जिस परिस्थिति तंत्र का निर्माण होता है वह भी भाग्य के निर्माण में बहुत महत्वपूर्ण होता है l शाब्दिक अर्थों में हम अगर भाग्य को परिभाषित करें तो हमारे पूर्वजन्म के कर्मों और हमारे पूर्वजों के कर्मों और उस समय की ग्रहों एवं नक्षत्रों की चाल से जन्म लेते समय जिस वातावरण का निर्माण होता है उन परिस्थितिओं की गणनाएं ही हमारा भाग्य कहलाती है और जिसे हम अपने सदकर्मो और सदगुरुदेवजी के आशीर्वाद के द्वारा परिवर्तन कर सकते है l

सभी मनुष्यों के जीवन में भाग्य को सुधारने का, सवांरने का समय आता है परन्तु उसे वह माहौल नहीं मिल पाता और जब वह माहौल मिलता है तो अपने कर्म से भटक जाता है l उन्हीं सद्कर्म करने की इच्छाओं और माहौल का निर्माण तभी हो पाता है जब हम सदगुरुदेवजी के चरणों में अपने अहं को त्याग कर समर्पित हो जाते है, नतमस्तक हो जाते है और उनके आशीर्वाद और कृपा का पात्र बनते है अर्थात अपने भाग्य को सवांरने के लिए जीवन में सदगुरुदेवजी का आशीर्वाद होना परम आवश्यक है l


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