Saturday, 23 June 2012

कलश पूजा


कलश पूजा


              पूजा से धर्म और सांस्कृतिक का बचाव नहीं होता अपितु पूजा से समृद्धि, के साथ साथ सात्विक विचारों की अभिब्यक्ति भी होती है l हिन्दू धार्मिक अनुष्ठानों में पूजा करने के लिए भिन्न भिन्न प्रकार के देवी देवताओं को स्थापित कर उनकी पूजा की जाती है l और उन्ही में से एक है कलश स्थापना और कलश पूजा करना l कलश को हम घड़ा, मटका, सुराही आदि नामों से जानते है l कलश को वैसे तो लक्ष्मी का रूप मानते है पर इसकी स्थापना एवं पूजा करने से सिर्फ लक्ष्मी की ही नहीं वल्कि आकाश, जल, थल एवं समस्त ब्रम्हांड की भी पूजा हो जाती है l जिससे हमारे विभिन्न प्रकार के दोषों का निवारण अपने आप ही हो जाता है और सौभाग्य एवं ऐश्वर्य में वृद्धि होने लगती है इसलिए घर में कलश की स्थापना करनी ही चाहिए l
कलश स्थापना की विधि:-
v  कलश स्थापना के लिए तांबा व पीतल के कलश का इस्तेमाल भी कर सकते है पर कलश पृथ्वी का प्रतिक होने के कारण लालिमा आभा लिए मिट्टी का कलश अधिक उपयुक्त है l कलश काला या दागदार नहीं होने चाहिएl

v  कलश की स्थापना किसी भी धार्मिक अनुष्टान के समय, पूर्णिमा, अमावस्या या किसी भी शुभ तिथि में की जा सकती है l

v  कलश स्थापना करने के लिए सर्व प्रथम कलश को स्वक्छ जल से अच्छी तरह धोकर पोछ लेवें l

v  कलश को वस्त्र पहनने के लिए कलश के गले में मौली (रक्षासूत्र ) को तीन बार लपेटना चाहिए l

v  सत्य का सतत विकास की ओर अग्रसर होने के लिए प्रेरित करने वाला सतिया (स्वास्तिक ) का निशान कलश के मध्य में रक्त चन्दन या सिंदूर से बनाने चाहिए l

v  उत्तर- पूर्व दिशा (ईशान कोण) में लक्ष्मी, कुबेर और जीवनदायनी जल का स्थान होने के कारण कलश की स्थापना पूजा घर के ईशान कोण में करनी चाहिए l

v  लकड़ी के बजोट या आसन पर सफ़ेद कपड़ा बिछाकर चावल या रंगोली से नौ ग्रह का प्रतीकात्मक अष्टदल बनाकर कलश को उसके ऊपर स्थापित करनी चाहिए l

v  कलश में गंगाजल, विभिन्न तीर्थ स्थलों के नदियों का जल या स्वक्छ जल भरना चाहिए l

v  कलश के अन्दर सर्वोषधि (दूब, वच, कुश, हल्दी, तुलसी आदि), पंचरत्न (सोना, चांदी, तांबा, पीतल, लोहा ), गोल सुपारी, चावल के कुछ दाने, मधु, इत्र, सिंदूर, तांबे का सिक्का या कोई भी एक या दो रुपये का सिक्का डालने चाहिए l

v  कलश के मुहं में समस्त शोक एवं दोषों के निवारण और दसों दिशाओं को इंगित करने के लिए अशोक या आम का दस पत्ता लगाना चाहिए l

v  कलश का कटोरीनुमा ढक्कन जिसे पूर्णपात्र कहा जाता है, पूर्णपात्र में लक्ष्मी स्वरुपणी धान डालकर कलश के मुंह को ढक देना चाहिए l

v  नारियल में लाल कपडे या मौली (रक्षासूत्र ) का धागा लपेट कर उसके ऊपर स्थापित करना चाहिए l ध्यान रहे नारियल का नोकीला भाग आकाश तत्व को इंगित करता है इसलिए नोकीला भाग सदैव ऊपर होने चाहिए l

v  तत्पश्चात धुप, दीप, फुल एवं मंत्रोपचार द्वारा विधि पूर्वक कलश का पूजन करना चाहिए l     
 
v  कलश के पानी को कभी सूखने न दे, हो सके तो हर पूर्णिमा या किसी भी शुभ तिथि में कलश में दोबारा विधिवत पानी भरने चाहिए l


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कली











कली

ऐ कली ठहर जरा, 
अभी सबेरा हुआ नहीं,
आंसमा की चादर ओढ़े सूरज सो रहा है,
भोर गीत गाकर,
किसी ने अब तक उसे जगाया नहीं l ऐ कली ……
अँधेरा भी जग रहा है, 
चाँद तारे भी जग रहे है,
झींगुर भी सिटी बजाकर रखवाली तेरी कर रहा है,
जग रहा है उल्लू अभी, 
जम्हाई उसे भी आया नहीं l ऐ कली ……
प्रहर करवट बदल रहा है, 
ब्रहम मुहूर्त अभी आया नहीं,
पक्षियों ने अभी चहचहया नहीं, 
पंख अपना फडफडया नहीं,
खिल गया अगर तू अभी, 
पंखुड़ी तेरे झुलस जायेगें
शीतल, मधुर, ठंडी पवन,
पूरब ने अभी बहाया नहीं l ऐ कली ……
बिखर जायेगें फिर खुशबू तेरे,
तितली भी पास नहीं आयेगा, 
भौंरा मौन हो जायेगा,
मधुर गीत फिर कोई गुनगुनाएगा नहीं ऐ कली ……


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BUD

Hey, wait a minute bud,
Not yet dawn,
Linen cloth of the sky the sun is sleeping,
Dawn singing,
Not yet woken up to a
Hey, wait a minute bud,
Not yet dawn,

The world is dark;
Stars are the moon is awakened,
Protect the whistle for your beetle is
Owl is still awake,
He was not yawning
Hey, wait a minute bud,
Not yet dawn,

time side changing
dawn moment was still not
twitter not just birds,
Feather your Wings spread not
If you still were blooming;
You will be leaving scorched petals
Soft, sweet, cold wind,
East had not yet shed
Hey, wait a minute bud,
Not yet dawn,

Scatter the fragrance, you will be leaving,
Butterfly will not get too close;
Bumblebee will be silent;
No one will sing the sweetest song
Hey, wait a minute bud,
Not yet dawn,

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Friday, 8 June 2012

एक कोशिश तो कर के देखो

 एक कोशिश तो कर के देखो




जीते है सब ही अपने लिए ,
कभी दूसरो के लिए जी के देखो l
मरते है सब अपनी ही मौत ,
कभी दूसरो के लिए मर के देखो l
आसान तो नहीं है कहना और करना l
पर बस एक कोशिश तो कर के देखो ll
भ्रष्टाचार  से समाज त्रस्त है l
अफसर हो या नेता सभी भ्रष्ट है l
पर गौर से देखो हम ही तो,
भ्रष्टाचार  से पस्त है l
सुधारो पहले अपने आपको,
एक तमाचा तबियत से,
अपने गालों पर जड़ के देखो l
आसान तो नहीं है कहना और करना l
पर बस एक कोशिश तो कर के देखो ll
क्यों हम इतने बेबस और लाचार है ,
क्यों हर तरफ रिश्वत और कालाबाजार है l
सोचो कभी हमने किसी को रोका है ,
सोचो कभी हमने किसी को टोका है l
मौन न बैठो, अब तो हौसला बुलंद करो,
बस ये काम चंद करो,
जगाओ अपने ही जमीर को l
बेबस सा रोना धोना बंद करो l
आसान तो नहीं है कहना और करना l
पर बस एक कोशिश तो कर के देखो ll
जीवन तब सुधर जायेगा,
उम्र भी आसानी से गुजर जायेगा l
कभी फिर न तू अकेला होगा,
हर तरफ खुशियों का मेला होगा l
रौशन हो जायेगा घर आँगन,
मुट्ठी में तारों को भर के तो देखो l
आसान तो नहीं है कहना और करना l
पर बस एक कोशिश तो कर के देखो ll


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Friday, 1 June 2012

सपना है या अनुभूति – 2


सपना है या अनुभूति – 2

          मैं सदगुरुदेवजी  के चरणों में नतमस्तक हुए बैठा था गुरुदेव मुझे आध्यात्मिक शक्तियों के बारे में बता रहे थे जिनको प्राप्त कर  मनुष्य की जीवन शैली में परिवर्तन लाकर अपने समस्याओं और कष्टों का निवारण भी कर सकता था l वे मुझे एक एक करके गुण रहस्यों के बारे में बता रहे थे, और मैं मंत्र मुग्ध सा उनके मुख मंडल को निहारे जा रहा था, मैं मन ही मन सोच रहा था की गुरुदेव मेरे इतने समीप थे और मैं बेकार ही उनको यत्र-तत्र ढूंढ़ रहा था l मैं भाव विभोर हो उठा - और आखिरकार मेरे मन की बातों को मेरे आँखों ने छलक कर गुरूजी  को कह ही दिया , मेरे गालों पर लुढ़कते आसुओं को देखकर गुरूजी ने मुझसे पूछा क्या हुआ बेटा? तुम्हारे आँखों में आसूं ? उनके इतना कहते ही मैं मन की पीड़ा को रोक न सका, मेरे आँखों में आसुओं का सैलाब सा उमड़ पड़ा, मेरा गला भर आया और मैं फुट फुटकर रोने लगा l

            गुरूजी ने मेरी पीठ थपथपाते हुए ढीढस बंधाते हुए मेरे रोने का कारण पूछने लगे, मैंने आसूं पोछते हुए रुआँसे होकर उनके चहरे को देखते हुए कहा- आप इतने दिन तक कहाँ थे, उनके चहरे पर मंद मंद मुस्कान तैर गई, और मुस्कुराते हुए बोले - मैं तो हर क्षण तेरे पास ही था, तेरे मन में था और तेरे हर दुःख से हर विपत्तियों में बचाकर तुझे सच्ची रह दिखा रहा था, वह मैं ही तो था,  पर तू ही मुझे पहचान नहीं पाया?  पर ये कैसे हो सकता है की आप मेरे साथ हो और मैं आपको पहचान नहीं पाऊ- मैंने असमंसस स्वर से उनको पूछा? बड़े ही सयंत स्वर में उन्होंने जबाब दिया - ये तेरे कुछ पुनर्जन्म के और कुछ इस जन्म के दोष थे जिसके कारण मैं तेरे इतने पास होते हुए भी तू मुझे पहचान नहीं पा रहा था, मैं आत्मा ग्लानी से भर गया आंसुओं की धारा तीव्र हो गई l तब, गुरुदेव ने मेरे आसुं पोछते हुए कहा - अब रोना छोड़? देख तेरे दोष तेरे इन आंसुओं से धुल गए है और तेरे लिए ही तो मैं यहाँ  आया हूँ तेरे अटूट प्यार श्रद्धा और विश्वास ने मुझे तुझसे साक्षात्कार करने पर मजबूर कर ही दिया l मैंने अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा - मुझसे दूर तो नहीं होंगे? गुरुदेव बोले बेटा हर पल ही तो मैं तेरे साथ हूँ जब जब तू याद करेगा मुझे साथ ही पायेगा l

             मैं सदगुरुदेवजी  के चरणों में नतमस्तक हो कर प्रणाम किया , और जैसे ही मैंने नजरें उठाई देखा गुरूजी के चेहरे पर वही मुस्कान थी वे मंद मंद मुस्कुरा रहे थे और उनकी छवि धीरे धीरे धुंधली होती जा रही थी, मैं सहसा उठ बैठा और देखा की गुरुदेव मेरे कमरे के दरवाजे में पूर्ण रूप से समाहित हो गए थे मैंने उनको पुनः सर झुका कर प्रणाम किया l
             
             मैंने घडी पर नजर दौड़ाई देखा रात के २:५६ मिनट हुए है मैं बिस्तर पर लेट गया,  और एक बार फिर मेरे आँखों में आसूं की धारा उमड़ पड़ी लेकिन ये आसूं सदगुरुदेव से विछुड़ने का नहीं था ये आसूं तो मुझे बोध करा रहे थे, एहसास दिला रहे थे मेरे दोषों का क्योकि अभी तो उनका साक्षात्कार सिर्फ सपने में हुआ है, पता नहीं कब मेरे दोषों का अंत होगा या होगा भी या नहीं? मेरी साधना मेरी पुकार उनको बुला सकती है या नहीं?  मैं कभी उनका साक्षात्कार कर पाउँगा भी या नहीं? ऐसे बहुत सारे सवाल मेरे मस्तिक में कौंध रहे है l

           अक्सर ये सवाल मेरे जहन में हिलोरे लेती रहती है , और विरह की यह वेदना आँखों से छलक जाया करती है l

सदगुरुदेव से मिलने की आस में ............



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