Tuesday, 15 May 2012

मुझे पप्पू बना दिया


मुझे पप्पू बना दिया

नाम कुछ और था, काम कुछ और था,
पर सबने मिलकर ,
काम कुछ और बता दिया,
नाम कुछ और बता दिया l
चीखता रहा चिल्लाता रहा,
पर सबने मिलकर ,
आख़िरकार,
मुझे अप्पू सा पप्पू बना दिया ll
फक्र था मुझे भी, अपने चरित्र पर,
बनाना चाहता था मैं भी, 
समाज के लिए प्रेरक,
पर सबने मिलकर,
न जाने ये कौन सा, रास्ता सुझा दिया l
शर्मसार हो रहा हूँ मैं,
सबने मिलकर,
आख़िरकार,
मुझे टपोरियों सा टप्पू बना दिया ll
स्वच्छ मन था बातों में वजन था,
शब्दों में जान थी समाज में मान था,
पर अर्थ का अनर्थ बताकर ,
सबने ये क्या पाठ पढ़ा दिया l 
दोअर्थी सी बातें है अब मेरी,
सबने मिलकर,
आख़िरकार,
मुझे गोल गोल घूमने वाला लट्टू बना दिया ll
चापलूसी से दूर भागते भागते, 
पिछड़ तो गया था मैं,
पर आगे बढ़ने की होड़ में,
सबने मिलकर,
आख़िरकार,
जी हजुरी करने वाला,
आगे पीछे घूमने वाला,
मुझे चम्मचों सा चप्पू बना दिया ll 


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Monday, 14 May 2012

धन क्यों कमायेगा



धन क्यों कमायेगा














धन क्यों कमायेगा, 
किसका हुआ है धन,
जो तेरा साथ निभायेगा l
चिपकाये रहेगा जीवन भर,
अंत में वो ही तेरा साथ छोड़ जायेगा l
अधिक हुआ धन अगर,
पहले पहल सारी दुनियाँ, 
कुत्ते सा पूंछ हिलायेगा l
लालच फैलेगा अपनो में,
चोर डाकू के साथ साथ, 
सगे सम्बन्धी भी दुश्मन बन जायेगा l
धन देगा तब तक याद करेंगे, 
मरने पर तेरे, 
सब कुछ भूल जायेगा l
सड जाएगी लाश तेरी, 
जमीन पर पड़ी पड़ी,
बेटे भी पर पहले,
धन का बँटवारा करवायेगा l
इसीलिए कहता हूँ, 
धन तू क्यों कमायेगा l
किसका हुआ है धन, 
जो तेरा साथ निभायेगा l
धन के बदले अगर, 
प्यार जो तू कमायेगा l
प्रेम फैलाकर दुनिया में, 
सबको अपना बनायेगा l
जितना बांटेगा उतना फैलेगा, 
चोर डाकू भी चीन नहीं पायेगा l
सत्य अहिंसा को अपनायेगा तो, 
महात्मा सा बन जायेगा l
सबके जुबां पर होगा नाम तेरा,
मरने पर अमर तू कहलायेगा l
इसीलिए कहता हूँ, 
धन तू क्यों कमायेगा l
किसका हुआ है धन, 
जो तेरा साथ निभायेगा l


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Thursday, 10 May 2012

नन्हा फ़रिश्ता


नन्हा फ़रिश्ता

प्यार का बनाने एक नया रिश्ता,
आया आया एक नन्हा फ़रिश्ता l
साथ अपने वो बहार लाया,
मुठ्ठी में समेटे प्यार लाया l
आँखे है उसके बड़े प्यारे,
चमके जैसे हो चाँद सितारे l
देख देखकर हमको वो तो,
कभी रोता तो कभी है वो हँसता l 
प्यार का बनाने एक नया रिश्ता,
आया आया एक नन्हा फ़रिश्ता ll
पालने में माँ जब उसको सुलाए,
देख देखकर मन अपना बहलाये l
प्यार से जब उसको पापा सहलाये,
फिर भी मुन्ना कह नहीं पाया l
पापा पापा चाकलेट क्यों नहीं लाये,
दादा दादी लेते बलाएँ,
कुछ न जब उनको सूझता l
प्यार का बनाने एक नया रिश्ता,
आया आया एक नन्हा फ़रिश्ता ll
फूलो सा महके है वो तो,
हवा उसकी महक चुराता l
घर आँगन में उसको फैलाता,
मन में नया उमंग जगाता l
झुक जाती शरमाकर फूलों की डाली,
मंद मंद मुस्कुराते जब वो दिखता l
प्यार का बनाने एक नया रिश्ता,
आया आया एक नन्हा फ़रिश्ता ll





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Tuesday, 8 May 2012

बिजली की आंखमिचौली


बिजली की आंखमिचौली 

शक्ति का रूप वह,
बिन आग के भी है वो जली,
हर तरफ फैला है जो,
नाम उसका है बिजली l
रात में जब बंद हो जाती है रौशनी,
बढ़ जाती है सबकी परेशानी l
बंद हो जाती है जब टी.वी. ,
गुस्से होते है बच्चे बीबी l
कड़ककर कहती है नहीं चल रहा है पम्प हीटर,
खाना नहीं मिलेगा बिछा लो बिस्तर l
मैं बहुत धीमे से कहता हूँ,
नहीं चल रहा है जब हीटर और पम्प l
हैण्ड पम्प से मटका भर,
लकड़ी से खाना बनाने का अपना लो ढंग l
चीखकर वो कहती है,
क्या कहा?
एक भी दिन हमने ठीक से बिजली पाई है l
नहीं जानते?
हर महीने कितने रुपये बिजली बिल पटाई है l
उसके गुस्से के डर से चुपचाप रहता हूँ l
वो बोलती है और मैं कुछ नहीं कहता हूँ l
उसका पक्ष लेकर कहूँ तो, 
मुझे जोरू का गुलाम कहेगें l
पर जरा सोचो?
बिजली के बिना हम कैसे रहेंगे l
कब तक, आखिर कब तक हम अन्याय सहेंगे l
तब तक अन्याय होगा, 
जब तक हम कुछ नहीं कहेंगे l


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Monday, 7 May 2012

सपना है या अनुभूति - 1


सपना है या अनुभूति - 1

वह पल रह रह कर मेरे स्मृति को विस्मित कर रहा था उस रात अचानक मेरी आँख खुल गई थी, मेरा मन विचलित हुआ जा रहा था, मैंने उठ कर दरवाजा खोला और नजरें घुमाकर कर जायजा लिया तो देखा की सब कुछ मौन है l  झींगुर  की भी आवाज  कानों  तक  नहीं पहुँच पा रही थी पता नहीं क्यों आज सब चुप से दुबके हुए थे और चारों ओर सन्नाटा ही सन्नाटा छाया हुआ था l

मैं जैसे ही दरवाजा बंद करके पलटा तब मुझे पहली बार उस गहरी अन्धकार का साक्षात्कार हुआ, प्रकृति की वह चकाचौंध जो मैंने दिन के उजाले में देखी थी विलुप्त हो चुकी थी, ऐसा लग रहा था मानों पूरा आकाश मंडल ही राहू का ग्रास हो गया हो, वह चिर अन्धकार मेरे मन को झकझोर कर रख दिया, मन में भय की एक लकीर खिचतीं सी चली गई, पर पता नहीं क्यों उस भय से मैं विचलित नहीं हुआ, कोई शक्ति थी कोई आवाज थी जो मुझे उस अन्धकार की तरफ खींच रही थी और मैं चाह कर भी अपने आप को रोक नहीं पा रहा था आख़िरकार माँ और सदगुरुदेवजी को मन ही मन याद कर मैं उस काले समंदर में कदम बढ़ा ही दिया जहाँ से न तो मंजिल ही दिख रही थी और न ही रास्तों का कुछ पता लग रहा था, कुछ देर मैं यु ही दिशाहीन भटकता रहा, चलता रहा पर अचानक पता नहीं कैसे मेरे पैरों में गजब की स्फूर्ति आ गई, पैर जमीं पर टिक नहीं रहे थे मेरे रफ़्तार में तेजी आ गई थी मैं पूरी वेग से दौड़ता चला जा रहा था, दौड़ता चला जा रहा था यु ही कब तक दौड़ता रहा उसका मुझे कोई होश नहीं थाl

अब मेरी धड़कन जोर जोर से धडक रहा था पूरा शरीर थकान से निढाल हुआ जा रहा था, सारा अंग मन से विश्राम की अनुमति मांग रहा था, पर मन पर न जाने क्या धुन सवार था की उनकी बातों को स्वीकार करने को तैयार ही नहीं था अंतत: सारा शरीर निढाल होकर ढीला पड़ गया और एक पेड़ के समीप गिर पड़ा, कुछ देर बाद आँखों ने हरकत की नजर घुमा कर देखा तो एक प्रकाश पुंज अँधेरे को चीरते हुए मेरे आँखों से टकरा रही थी मैं सहसा उठा और उस प्रकाश की दिशा में दौड़ने लगा ज्यों-ज्यों मैं आगे बढ रहा था वह प्रकाश बढ़ता जा रहा था धीरे-धीरे उस प्रकाश ने मुझे अपने में समाहित कर लिया, अब मैं एक मंदिर के सामने था अखंड सूर्य से प्रकाशित स्वच्छ सफ़ेद मंदिर मुझे आलौकिक आनंद की अनुभूति करा रहा था, मेरी जिज्ञासा बढ रही थी और उस जिज्ञासा ने मुझे अन्दर प्रवेश करने से रोक नहीं पाया l सीढियाँ चढ़ते-चढ़ते मैं दरवाजे के पास पहुंचा, दरवाजा बंद था मैंने आँखें बंद कर के एक बार फिर से माँ और गुरूजी स्मरण किया l और ऊपर लटकती हुई घंटी को बजा कर दरवाजा खोलने के लिए जैसे ही कदम बढ़ाया सहसा मेरे मुख से एक चीख निकल पड़ी मेरा पैर किसी वस्तु से टकराया था जिसकी मैंने कल्पना ही नहीं की थी मैंने नीचे नजर झुकाई तो देखा की एक नरमुंड पड़ा है मेरे मन में भय की पुनरावृति हो गई, भय से बचाव के लिए मैंने इधर उधर नजरें दौड़ाई तो देखा सैकड़ों नरमुंड ऐसे ही यत्र-तत्र बिखरे पड़े है उस नज़ारे को देख कर मैं इतना भयभीत हुआ की भय ने मुझे झकझोर कर रख दिया l मेरे मुंह से चींख निकल गई और मैं आँखें खोलते हुए उठ बैठा l

देखा - मैं बिस्तर में बैठा हुआ हूँ, तब मुझे एहसास हुआ की यह मेरी निंद्रा अवस्था की सोच थी, मात्र एक सपना था, पर कहते है की सपने अक्सर किसी घटना से जुड़े होते है पता नहीं यह कहाँ तक सच है?  मैं नहीं जानता? पर कभी-कभी यह प्रश्न आज भी मेरे जहन में उठता है की? वह कौन सी शक्ति थी जो मुझे खींच रही थी?  कही वो सदगुरुदेव की आवाज तो नहीं थी जो मुझे खींच रही थी? वह शक्ति मुझे क्यों खीच रही थी? आखिर वह शक्ति मुझे क्या याद दिलाना चाह रही थी? क्या यह मेरे पिछले जन्म की कोई घटना थी?  पिछले जन्म में मैं कौन था? मैं वहां क्यों और कैसे पंहुचा था?  या यह आने वाली कोई घटना से मुझे अवगत करा रही थी? 

इन्ही सारे सवालों की जवाब ढुंढने की कोशिश में.............


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