Sunday, 1 April 2012

गए ये कैसे भूल


गए ये कैसे भूल


हँसना भुला दिया है तुम्हारी खौप ने,
वीरान सा बना दिया है गुलशन को,
बहारें ही न हो गुलशन में, 
तो कैसे खिलेंगें, कैसे महकेंगें फुल l
तुम्हारे ही डर से नहीं खिल रहे है फुल l
गए ये कैसे भूल ll
अधिकारों कर्तव्यों से मुह मोड़कर, 
जाने किस सिद्धांतों में उन्मत हो, 
संस्कृतियों को रौंद रहे हो अपने ही पैरो से, 
पूरा देश आतंकित है तुम्हारे आंतकों से,
तुम्ही ने गन्दा किया है समाज को,
और उड़ा रहे हो दुश्मनी का धुल l  
गए ये कैसे भूल ll
गाँधी, सुभाष और जवाहर मिट गए है,
तो समझते हो, हो गया गुंडाराज,
भूल गए उन जवानों को,
जिनको है आज भी देश पर नाज,
तेरे चहरे को भी वो पहचान गए है, 
कत्लेआम वो भी कर सकते है, 
पर उन्हें देश से प्यार है, 
चुप है तो बस इसलिए, 
क्योकि उन्हें समय का इंतजार है, 
चुभ रहे हो सीने में, तुम्ही बन के शूल l  
गए ये कैसे भूल ll
मत भूलो जिस शक्ति, जिस जवानी का तुम्हे घमंड है,
वो सिर्फ दो दिन का मेहमान है,
ढली जवानी हो जाओगे बरबाद,
अब भी समय है तुम्हारे पास,
बदल दो अपने आप को, बदल दो गन्दा समाज,
सब रहो मिलजुल, 
विद्रोह, दुश्मनी जाओ तुम भूल l
तुम ही तो हो इस देश का,
परिवार, कुटुंब और कुल, 
गए ये कैसे भूल ll



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