Friday, 20 January 2012

निशा का प्रेम


निशा का प्रेम

एक दिन जब मैंने,
जलाई प्यार से ज्योति l
देखा छिपकर निशा को रोती l
मैंने उससे पूछा?
निशा तू क्यों है रोती l
सिसक सिसककर निशा बोली,
मेरी प्रिय सखी, सहेली ज्योति l
दोनों ही खेलने आते,
लेकर हाथों में हाथ l
समय बिताते दोनों साथ ही साथ l
सुख दुःख में भी,
हमेशा साथ रहते l
सब हमको दो बहने ही कहते l
सबके दुखो को वो हरती,
जीवन में खुशियों को भरती l
पर जबसे तुमने ज्योति जलाई है l
मेरे मन में एक डर सी समाई है l
आंधी और तूफां से,
कही ज्योति बुझ न जायेगी l
हर यादें तब,
मुझे हर पल तडपायेगी l
मैंने जब हाथ फेरा,
उसके बालो पर l
देखा निरंतर लुढ़क रहे थे,
आश्रू धारा उसके गालो पर l
आंसुओं को पोछकर,
कहा थोडा सोचकर l
जब कभी ज्योति बुझ जायेगी l
तन्हाई तडपायेगी l
तेरे मन की डोर से बंध,
फिर आऊंगा l
बिराने में फिर से मैं,
प्यार की ज्योति जलाऊंगा l


(इन रचनाओ पर आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए मार्गदर्शक बन सकती है, 
आप की प्रतिक्रिया के इंतजार में l)
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