Sunday, 22 January 2012

चांदनी


चांदनी

चाँद ने जब अपनी चांदनी फैलाई l
सुबह समझकर उल्लू बोला,
रातरानी भी भूल से खिल आई l
झिंगरा अब मधुर तान सुनाती,
चाँद शरमाकर तब बादलों में छिप जाती l
लुका छुपी का ये खेल निराले,
आँखे फाड़े देख रहे थे तारे l
निकल पड़े जानवर सभी अपने काम से,
सो रहा था पर इन्सान आराम से l


(इन रचनाओ पर आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए मार्गदर्शक बन सकती है, 
आप की प्रतिक्रिया के इंतजार में l)

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